Thursday, October 19, 2017

मजाज़ जन्मदिन मुबारक

दो नाम मजाज़ और मंटो।।इनके दिलों को ज़मीन के बंटवारे ने कमज़ोर कर दिया।मजाज़ भले ही मंटो से सात आठ महीने बड़े रहें हो मगर मंटो ने मजाज़ से दस महीने पहले रुखसत होकर यह फासला भी खत्म कर दिया।सन् 55 की शुरआत मंटो को ले गई तो जाता जाता सन् 55 अपने साथ मजाज़ को भी लेते गया।
एक ने कहानियाँ बुनी तो एक ने ग़ज़लें।दोनों में एकसा दर्द।दोनों की कैफ़ियत एक सी,मसखरे इतने की ज़िन्दगी मज़ाक बन गई।अर्रे हम भी मजाज़ को याद करते करते मंटो तक चले गए।दिमाग अजब बहका है मेरा भी,यह भी नही की मजाज़ को पहले आजके दिन की पैदाइश की मुबारकबाद तो दे देते।लेकिन क्या करें,यह दोनों कच्ची उम्र की मौतों ने जितना मेरे ज़हन पर ज़ुल्म किया है,उतना किसी चीज़ से नही हुआ।
मजाज़ को रुदौली से लखनऊ,अलीगढ़,दिल्ली,बम्बई किन किन गलियों से पहचाने।जब जब गुज़रता हूँ तो लगता है की अभी मजाज़ निकल के गए हैं यहाँ से,सब बेरौनक हो रखा है।मुझे मजाज़ की नज़्मों से ज़्यादा मजाज़ की ज़िन्दगी अपनी ओर घसीटती है।जब मैं किसी अमीर शख्स की महफ़िल में अपने फ़न की नुमाइश के लिए बुलाया जाता हूँ,तो मजाज़ मेरा हाथ पकड़,मुझे रोक लेते हैं।
रोक कर कहते हैं की यह तुम्हे बेइन्तहां चाय पिलाएंगे जैसे मुझे शराब पिलाते थे।जब इनकी तबियत भर जाएगी तो तुम्हारे लिए भी सर्द रात में बाहर का दरवाज़ा खोल देंगे और तुम अपनी वाह वाह वाह वाली आवाज़ों के शोर को सुनते सुनते कहीं लेट सड़क पर लेट जाओगे और कोहरा चादर बनकर तुम्हे ढँक लेगा,जहाँ सबकी तो सुबह होगी मगर मजाज़ की नही...
मैं रुक जाता हूँ और मजाज़ से ज़िन्दगी के तमाम तजर्बे पर बात करता रहता हूँ।इतनी बात,इतनी बात की कहने को कुछ रह ही नही जाता तो दोनों चुप होकर एक दूसरे को देखने लगते हैं।उन्हें शिकवा की मैं पहले क्यों नही आया,हमे शिकवा की वह थोड़ा और क्यों नही रुके,यूँहीं,बस यूँहीं मजाज़ मेरे पास से उठकर चले जाते हैं और मेरा Happy Birthday my dear mjaz अनसुना रह जाता है... हमेशा की तरह अनसुना..

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