Tuesday, October 31, 2017

मौसम गुलाबी नही है

वक़्त तेज़ी से बदल रहा है।हमारी ज़िन्दगी में जाड़ा दाखिल हो रहा है।न आहिस्ता और न ही तेज़,बस वह आ रहा है।न दबे पाँव और न ही शोर करते हुए,बस वह आ रहा है।उसे तो आना ही है क्योंकि ज़मीन में दफ़न बहुत से बीजों में ज़िन्दगी जो फूटनी है।
मुझे लगा मौसम का यह गुलाबीपन हमारे लिए आया है।मेरे कंधो पर रखे सर के लिए आया है।फैले हुए बदन को सिमट जाने के लिए आया है मगर नही,वह तो किसी और के लिए आया है।

यह जाड़ा हम इंसानों के लिए नही बल्कि ज़मीन में बोए बीज के लिए आया है।ठण्ड में ठिठकती मिटटी में कोपल फोड़ने के लिए आया है।यह तो पत्तो को हल्के हल्के नहलाने आया है।यह तो खेत में मिटटी की रेत से झाँक रही हल्की हरी हरी उम्मीदों को दरख्त बनाने आया है।
ख्वामखा हम इनके आने में शब्द पिरोते,यह भी तो किसान के लिए आया है।

ईश्वर की भेजी यह ठण्ड की शाल भी तो निर्माण की है।हम मोहब्बत के गीत गाएंगे और कोई खेत में खड़ा हमारे गाते रहने के लिए इसी ठण्ड को लपेट फावड़ा चलाएगा।है न अजीब,एक ही मौसम एक के लिए गुलाबी है तो एक के लिए निर्माण का उद्घोष...ठण्ड सिर्फ उन बीजों के लिए आई है, जिनमे सृष्टि के निर्माण का विस्तार होना है,बाकि सब तो रौशनी के पतंगे हैं....

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