कल रात जैसे ही मेरे कंधो पर बेले की कलियों वाले मेहँदी लगे हाथ पड़े,मैं चौंका।इस क़दर रात में यह बेले की महक और यह हाथ,पलट कर देखता हूँ तो उमराव खड़ी मुस्कुरा रही हैं।
मैं बोलता की मेरे होंट पर हाथ रखकर बोलीं की कल तो तुम मेरे बड़े शिकवे कर रहे थे।की मैं तुम्हारी रात अपने साथ कब्र में लिए गई।कब्र में ले जाएँ मेरे दुश्मन,देखो तुम्हारे सामने ताज़ी खड़ी हूँ।
ऐ बड़े आए उमराव को कोसने वाले,जाओ उन घरों के चक्कर लगाओ जहाँ उमराव की पाँव की धूल भी नही है और तुम मंडराते रहते हो।उमराव ने तो उतने दिन तुम्हारी ज़िन्दगी में धड़कन डाल दीं, जितने दिन के लायक थे तुम।
बेले की महक से जब ध्यान हटा तो मैंने उमराव से पूछा इतनी उखड़ी उखड़ी क्यों हो।शिकवा ही किया था अपना जानकर।यह सुन उमराव ने झिड़का बड़े आए अपना कहने वाले।कल तक जब पाँव थिरकते थे उमराव के तो जनाब पैरों में पड़े मिलते थे।उमराव की साँस क्या उखड़ी उसे कनीज़ों के कब्रिस्तान में दफना आए।बाँहों में पड़े पड़े मुरझा जाने वाले तुम्हारे पुरखों ने अपने बगल में दो गज कब्र भी नही दी।अब आए हैं हुज़ूर उमराव के दिल पर हाथ रखने।
जाइए,अब आपकी ज़िन्दगी में ठहराव नही आएगा।अब उमराव नही रही जो दौड़ती भागती साँसों को लगाम लगाकर,सख़्त धूप से सूखी ज़बान की प्यास बुझाकर फिर से चलने लायक कर दिया करती थी।अब दौड़िये,जी भर दौड़िये,जब तक फेफड़े मुँह से निकल कर सामने न गिर जाएँ।उमराव की छाँव नसीब वालों को मिलती है।अब ठहराव भूल जाइये,उमराव ही नही रही तो कैसा ठहराव...बेले की कलियाँ ही सूँघिये,वह भी नकली......और मैं जग गया,बदन से बेले और उमराव की गुँथी हुई महक भी तो नही आ रही।सब ख्वाब भी तो नही था...
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