यह जो सामने पालक पनीर,राजमा चावल और रोटी से सजी थाल है।ज़रा नज़रें झुका कर देखिये इसे।जब यह ज़बान पर पहुँचता है तो ज़बान लपक कर इसे समेट लेती है।दांत ख़ुशी ख़ुशी इसे चबाते हैं।यह सब मिलकर पेट से उठ रही ज़बरदस्त भूख को मिटाने चल देते हैं।गले से सरकता हुआ निवाला पेट में पहुँचता है।जिस्म के हर हिस्से अपनी अपनी ज़रूरत की चीज़ें इससे लेने लगते हैं।खाने में मौजूद प्रोटीन,आयरन, विटामिन्स,ग्लूकोज़ जैसे सभी काम की चीज़ें पूरे जिस्म में बिखर जाती हैं।जब सब काम की चीज़ें निकल जाती हैं, तब क्या बचता है।
तब बचता है गू ,जो देर सबेर पेट से बाहर आ जाता है।अब ज़रा आईना देखिये।अपने जिस्म की तरह रूह को देखने की कोशिश कीजिये।रूह के लिए ज़रूरी चीज़ें इंसानियत,प्रेम,धैर्य,संवेदना,सेवा,सच्चाई उन विटामिन्स और मिनरल्स की तरह हैं।इनके निकल जाने पर आप खुद वैसे ही हैं जैसे पेट से निकला गू। जिस तरह पेट से निकला गू बदबू ही करता है,वैसे ही बिना मोहब्बत,इंसानियत के रूह भी बदबू करती है।जब रूह के ज़रूरी विटामिन्स और मिनरल्स नही मिलते तो वोह नफरत से अपनी ताक़त लेती है।जब नफ़रत रूह में दाखिल हो जाती है तब जो सड़ाँध फैलती है वोह अच्छे से अच्छे दिमाग को पागल कर सकती है।
तय करिये की रूह को क्या उसकी ख़ुराक आप दे रहे हैं।जिस्म तो चर ही रहा है, रूह को उसके हिस्से के विटामिन्स और प्रोटीन मिल रहे हैं।आप जो बेचैन,हैरान,परेशान घूम रहे हैं।यह कुछ और नही है बल्कि आपकी रूह को उसका हिस्सा नही मिल पा रहा।यक़ीन न हो तो इंसानियत को थामिये,रूह को सुकून मिलेगा तो बेचैनी भी दूर होगी।अगर इंसानियत को नही थामियेगा तो नफ़रत आपको झुल्साएगी।रूह भुनेगी,बेचैनी आपको वहशी बना देगी।
रास्ते बड़े साफ़ हैं बस अपनी आँखे साफ़ कीजिये सुकून से रहिये और रहने दीजिये।फ़ालतू के सवालों,नफ़रत से भरी बहसों,उलूल जुलूल कुतर्कों से अपनी गन्दगी के वायरस दूसरों में मत डालिये।भारत समेत दुनिया को अच्छाई की दरकार है।बुराई तो झव्वो में ढेर है।बस रूह में झांकिए और मुस्कान की वजह बनिए नाकी आँसुओं की वजह
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