सर सय्यद की पैदाइश का दिन करीब है,17 अक्टूबर।।जब पूरी दुनिया में बिखरे एएमयू के स्टूडेंट्स अपनी अपनी जगह सर सय्यद को याद करेंगे।उन पर बात करेंगे।अलीगढ़ तो सर सय्यद के प्रैक्टिकल की ज़मीन ही रही है, जहाँ उन्होंने अपने ख्वाब को ज़मीन पर उतारा था।
जब 17 अक्टूबर को सर सय्यद को याद किया जाएगा तो बहुत से प्रोग्राम्स होंगे,उनमे से एक है "सर सय्यद डिनर"।जब दस्तरख्वान पर सारे अलीग साथ होंगे और उनके बीच सर सय्यद की यादों का तज़किरा होगा।सर सय्यद डिनर में बहुत से वह लोग जाने को रह जाते हैं, जिन्हें वाक़ई में जाना चाहिए।यह सच है अगर सर सय्यद होते तो हाथ पकड़ कर उन्हें अपने दस्तरख्वान तक लाते और पेट भरने के बाद उनके हाथों में कलम किताब थमा देते और कहते जाओ इससे अपनी आने वाली नस्लों की किस्मत लिख डालो।
इस बीच हमारे ख़ुदाई खिदमतगार के साथी रिज़वान भाई,साद क़िदवई और दूसरे साथी अलीगढ़ जा रहे हैं।सर सय्यद डे मनाने।इन सबका मानना है की यह इस बार सर सय्यद डिनर झुग्गी झोपड़ी वालों, कूड़ा बीनने वालों और दूसरे कमज़ोर तबकों के साथ करेंगे।उनके बीच सर सय्यद के ख्वाबों को साझा करेंगे।सर सय्यद की वह तरबियत देंगे की भले हफ्तों भूखे रह लो मगर तालीम का साथ मत छोड़ना।सर सय्यद के तालीमी ख्वाब को इनके बीच रख,इनकी ज़िन्दगी की जद्दोजहद के बीच रास्ता निकालने में लगेंगे।हम सबका मकसद भी यही होना चाहिए की हमारे इर्द गिर्द मौजूद सबसे कमज़ोर तक हमारी सबसे बेहतर चीज़ पहुँचना ही चाहिए।
अलीगढ़ या दूसरे कोई भी जगह के लोग इस तरह के सर सय्यद डिनर और तालीम के मिशन में जुड़ना चाहे,वह अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पहुँच रहे ख़ुदाई खिदमतगार रिज़वान भाई से मिल ले।उनका साथ दे।सर सय्यद के ख्वाब की तामीर में लगे।अब उस तबक़े के लिए किताबो के वरख खोल दे जो दिन रात बड़ी मुश्किल से ज़िन्दगी गुज़ार रहा है।उनके बीच जाइये और भूख की तक़लीफ़ में इल्म की रौशनी पैदा कीजिये।उनके दर्द को महसूस कीजिये।सर सय्यद होते तो यक़ीनन इस वह अब तक उन ही लोगों में घूम रहे होते जो तालीम से अपनी परेशानियों की वजह से दूर हैं।वह उन्हें लाते, साथ बैठाते,खाना खिलाते और फिर वह इल्म के दरवाज़े खोल देते जिसने सालों से इनकी नस्लों की किस्मत पर पहरा बैठा रखा है।आप भी उठिये और सर सय्यद के इस ख्वाब को सर सय्यद डे पर ख़ुदाई खिदमतगार एएमयू टीम के साथ इस तरह के सर सय्यद डिनर पर,इल्म की रौशनी के लिए उन घरों के दरवाज़े खोल दीजिये,जहाँ अभी यह नही पहुँची है।उठिये,साथ आइये,जुड़िये और बढ़ चलिए....
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Monday, October 9, 2017
सर सय्यद डिनर
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hafeezkidwai
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