Thursday, October 12, 2017

मेरी मौत का साया

एक दोस्त मेरे पास आया।हैरान परेशान,उसकी माँ बीमार थीं।हफ्तों से अस्पताल में लेटी थीं।उन्हें ख़ून की सख़्त ज़रूरत थी।दोस्त की मुश्किल देख मैं झट से तैयार हो गया।अस्पताल पहुँचा मन में यह सोचकर की चलो यह ख़ून आज मेरे दोस्त के सर पर, उसकी माँ का साया बनाए रखेगा।

माँ अस्पताल में लेटी टीवी पर उस व्यक्ति को सुन रही थी जो हमारी मौत के मनसूबे बना रहा था।दोस्त ने यह देख झट से टीवी बन्द किया।मगर माँ तो माँ थी,मासूम,वह आगे ज़िक्र छेड़ती रही की देखो भय्या यह कितना अच्छा बोल रहा था,बेचारे को सब घेरे हुए हैं।
उनकी बात पर मेरा दोस्त मौन स्वीकृति के साथ चुप था।मैं ख़ून देने लगा,यह जानकर भी देने लगा की हाँ यह हमारी मौत का फरमान सुनाने वाले लोगों को अपना हीरो मानते हैं।

मैं जानता था की इन्होंने ही तो उन्हें चुना है।यह जानकर भी ख़ून दिया की यह भले हथियार न भी उठाए मगर इनका समर्थन हथियार उठाने वालों को ताक़त तो देगा ही।मेरे दोस्त ने मुझे सेब लाकर दिया,मैं चाहता था की कह दूँ,दोस्त यह लोग मेरे ख़ून के प्यासे हैं।मगर दोस्त की आँख में उतरे सुक़ून को देख खामोश रहा।

लौटते वक़्त किसी ने लगा,की पीछे से खींचकर मुझे मारा।एक के बाद एक खन्जर मुझमे उतरता चला गया।वह आखरी वार भीड़ ने जो मेरी गर्दन पर किया तो मैं सबके चेहरे देखता हुआ ज़मीन पर गिरा।मैं सबको पहचान रहा था।वह सारे अंजान लोगों में मुझे मेरा दोस्त दिख रहा था।मुझे हर मारने वाले में मेरा वही दोस्त दिख रहा था।सड़क पर हर तरफ बिखरे अपने ख़ून में पड़ा मैं उससे बोला दोस्त तुम भी...एक लफ़्ज़ फूटा की इसे सड़क पर बहाकर क्या फायदा हुआ,इससे तो बेहतर होता की वहीं बेड पर सारा ख़ून खींच लेते।कम से कम माँ के चेहरे पर लाली तो आ जाती..और मैं अपनी माँ के चेहरे की सफेदी सोच मर गया...

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