Tuesday, October 24, 2017

साहिर साहिर

हम अजब पागल से लोग हैं।एक ऐसे बच्चे जो अपने कुर्ते के छोटे से दामन में तमाम कंचे समेट लेना चाहता है मगर एक न एक कंचा उस दामन को छोड़ बाहर निकल जाता रहता और बच्चा सबको समेटने की नाकामयाब कोशिश करता रहता है।हम सब भी तो ऐसे ही हैं, रोज़ उन नामो को समेटते हैं जो हमारे बीच से चले गए,उनका ज़िक्र करते हैं, उन्हें याद करते हैं मगर कोई न कोई छूट ही जाता है और दिल का मुँह खुला रह जाता है।कल रफ़ी अहमद क़िदवई को याद किया तो सरहाने मन्ना डे आ गए,रात गुज़रते गुज़रते पैतयाने गिरिजा देवी भी आकर बैठ गई।

सोचा चलो एक मसेहरी पर यह तीन सही मगर रात और गहराती और सुबह दस्तक देती की साहिर आ गए।साहिर के हिस्से का दर्द भी तो उसी मसेहरी पर बैठना है।अगर यह सब एक ही साल में आगे पीछे गुज़रते तो दिल तो फट ही पड़ता।साहिर अपने साथ अमृता को भी तो लाए हैं।उँगलियों में उँगलियाँ फंसाएं ग़ज़ल कहानी की शक्ल में मेरे दरवाज़े पर खड़ी है।

अमृता ने लिखा है एक बार दिल्ली में दुनियाभर के राइटर्स का सेमिनार हो रहा था ,उसमे हम और साहिर भी थे। साहिर और हमें भी अपने अपने नामों के बैज दिए गए। मगर शरारतन या कहे मोहब्बत की वजह से साहिर ने मेरा और मेरे साहिर के नाम का बैज लगा लिया। स्टेज पर एक जनाब आए और माफ़ी मांगते हुए कहा "अरे अमृता जी गलती से आपको गलत बैज दे दिया गया है...अभी सही करवाते है" इतने में तपाक से साहिर ने जवाब दिया " गलती आपसे हुई थी मगर हमने सही कर ली है आप इत्मीनान रखें।

अमृता आज ही की उस रात के ज़िक्र में कभी कुछ न लिख सकी जिस रात साहिर ने दुनिया को अलविदा कहा था। अमृता को रात २ बजे बुल्गारिया में खबर मिली की साहिर इस दुनिया से कूच कर गए। वह पूरी रात फोन के पास बैठी रोती  रही। अमृता ने एक जगह कहा भी " हमें लगता है ख़ुदा से गलती हो गई। उस दिन हमने जो बैज बदले थे।फरिश्तों को उन्ही नामो का धोखा हो गया।
जब साहिर की मौत की खबर अखबारों में छपी तो एक बड़े अख़बार ने क्या किया। अमृता की बड़ी सी तस्वीर पहले पेज पर छापी उसमे अमृता की आँखे आंसुओं से भरी हुई थी और हेडलाईन थी साहिर………। साहिर.......साहिर…………

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