Tuesday, October 10, 2017

सिस्टर निवेदिता

हमे आज तक समझ नही आया की कोई कैसे खुद से आज़ाद हो जाता है।कोई कैसे अपनी रूह की बेड़ियाँ अपनी उँगलियों से काट देता है।कोई कैसे सारी दुनिया की ज़मीन को अपना बना लेता हैं।यह हैं "मार्गरेट एलिजाबेथ नोबुल" जो मामूली सी उम्र में हमें आज ही के दिन छोड़ गईं।

आयरलैंड की यह युवती जब भारत में पांव रखती है तो उसके अंदर बुद्ध होते हैं और सामने विवेकानंद,उसके गुरु।जो उसे कहते हैं जाओ और इस भारत भूमि में खुद को ढूंढ लो,यहीं किसी जँगल,किसी कुटिया, किसी खेत में तुम हो और वह भारत भर का दर्शन करने निकल पड़ती है।

जितना वह भारत में घूमती है उतना ही उसके दिल की परते खुलती जाती हैं।बुद्ध का दर्शन दिल में लिए और विवेकानंद का सबक याद करके वह कलकत्ता में ठहर जाती है और यहीं से भारत की सबसे बड़ी ज़रूरत महिला शिक्षा में जुट जाती है।वह इस देश की गुलामी की बेड़ियाँ भी काटने में लग जाती है।जब सब थक रहें होते हैं तब वह उठकर हर एक के पाँव के छालों पर मरहम रखती है।यह करते करते भारतवासियों के दिल में "सिस्टर निवेदिता" के नाम से कहीं खो जाती है।
हम सबको देखना होगा की हमारे देश के बनने में किसका किसका हाथ है।

एक आयरिश लड़की अपने देश छोड़ हमारा देश बनाने के लिए अपना घर बार छोड़ आती है,रिश्ते नाते छोड़ आती है।विवेकानंद के पीछे चलते चलते हमारे देश को बुनने में लग जाती है।हो सके,अगर दिल में ज़रा भी जगह हो और महसूस होता हो की हाँ,हमारे देश को बनाने में हर एक का ख़ून पसीना लगा है, तो आज सिस्टर निवेदिता को याद कीजियेगा।उनकी मोहब्बत भरी थपकियों को महसूस कीजियेगा।निवेदिता बहन 44 साल की मामूली सी उम्र में इसी सप्ताह अपने देश भारत में ही हम सबको छोड़ गईं थीं,आपको सलाम सिस्टर निवेदिता....

No comments:

Post a Comment