आजके नवभारत टाइम्स में स्पीकिंग ट्री पढ़िये । कुछ चीज़ें सिर्फ पढ़ने भर की नही,बल्कि समझकर,खुदमे उतारकर,आगे वाली नस्ल में भेजने के लिए होती हैं, इन्हें ज़िम्मेदारी कहा जाता है । मूल लेख नीचे पढ़िये,लिंक कमेंट बॉक्स में है
जब राम ने जंगल की तरफ कदम बढ़ाए.जब बुद्ध ने वटवृक्ष के नीचे ध्यान लगाया.जब मोहम्मद ने पहाड़ पर हिरा नाम की गुफा में कदम रखे और जब ईसा ने एक भी हरी घास का तिनका न तोड़कर अहिंसा का संदेश दिया.तब आखिर वह क्या था जो वह कहना चाह रहे थे और हमसे लगातार छूटता जा रहा था.एक बार इसपर गौर से देखिये की वह जिन साधनों का प्रयोग कर रहे थे,वह हमे क्या संदेश दे रही थीं.धर्म वह नही जो बोला जाए,धर्म वह है जो समझा जाए.आध्यात्म वह नही जो दिखाया जाए,आध्यात्म तो वह है जो किया जाए.इन सबने जिस एक चीज़ को पकड़े रखा उसे कहते हैं प्रकृति .
इन्होने हमे बताया की प्रकृति की गोद में जाओ,वहीं मानवता का वह बीज जय,जिससे संसार मुस्कुरा सकता है.हम तमाम आडम्बरो में उलझते हुए इस प्रक्रति से इतना दूर हो गए की अपने रास्ता दिखाने वालों की ही नही सुनी.यह अपने हर कदम से हमे बता रहे थे की प्रकृति के करीब आओ,मुक्ति यहीं है,शांति यहीं है.जल,जंगल,जमीन की फ़िक्र करो,क्योंकि इनमे ही ईश्वर है.वह ईश्वर जो हमे और तुम्हे जीवन देता है.
प्रकृति एक ऐसी चीज़ है जिससे हम प्रेम करे या न करें,वह हमारी सेवा करेगी.प्रेम करने से यह सेवा आने वाले बच्चो तक जारी रहेगी,न करने से हमारे ही जीवन में यह सेवाएँ समाप्त हो जाएँगी. हर धर्म प्रकृति को प्रणाम करके संसार में फैला है अगर हममे वाकई धर्म है तो भला हमारे होने से प्रकृति को नुकसान कैसे हो सकता है. हमने आजतक गलती किया की धर्म को प्रकृति से अलग हटाकर देखा जबकि पूरा धर्म ही प्रकृति के इर्द गिर्द रचा बसा गया. जो भी व्यक्ति के कर्म से प्रकृति को नुकसान पहुचे वह तो अधर्म के पाले में खड़ा अधर्मी है.
अब जब पानी को लेकर हाहाकार मचा हुआ है.तब यह भी देखना जरूरी है की आध्यात्म क्या कहता है.आध्यात्म तो यहाँ तक कहता है की प्राकृतिक संसाधनों का दोहन मूल आवश्यकता से अधिक मत करो,मूल आवश्यकता केवल जीवन ही तो है.अच्छा बड़ी मामूली सी बात है की हमने अपने लिए तो धरती का सीना फोड़कर साफ़ पानी निकाल लिया मगर दुसरे जीवो के लिए क्या किया. मानव अपने लिए नल तो लगा सकता है,ट्यूबवेल लगा सकता है मगर जरा यह बताएँ की दुसरे जानवर कैसे पानी पियेंगे.ज़ाहिर है उनके लिए प्रकृति ने नदिया,पोखरे,झरने बना रखे हैं.मगर हम मानव ने इन्हें इतना जहरीला कर दिया की उससे दुसरे जीवों के जीवन का संकट सामने आ गया.वह हमारे फैलाए जहर से मरने लगे.कहाँ मानव की ज़िम्मेदारी थी की वह दुसरे जीवों के जीवन को बेहतर बनाए कहाँ उसने उनके जीवन को ही नष्ट करने का मार्ग चुन लिया. एक आध्यात्मिक व्यक्ति कभी भी दुसरे जिव के जीवन को कष्टमय नही बना सकता.इसलिए कहते हैं आम लोगों के मुकाबले आध्यात्म से भरा व्यक्ति अधिक सजग होना चाहिए. उसके अंदर प्रकृति को लेकर निस्वार्थ प्रेम होना चाहिए.एक अध्यात्मिक व्यक्ति प्रकृति का सेवक होता है.उसे जीवनभर प्रकृति की रक्षा करनी चाहिए.
हम जब आध्यात्म की बात करते हैं तो हमे लगता है की आत्मा,शांति और ध्यान की बाते ही प्रयाप्त हैं.जबकि आध्यात्म इनसे बहुत आगे का विषय है.यह सबसे पहली ज़िम्मेदारी देता है की प्रकृति को बचाओ. जल,जमीन,जंगल की सेवा हर अध्यात्मिक व्यक्ति का कर्तव्य है.जबकि होता इसका उल्टा है,आध्यात्मिक व्यक्ति इनको छोडकर हर काम करता है.हमारे सारे मार्गदर्शक प्रकृति से ऐसे प्रेम करते थे जैसे वह ही ईश्वर हो,वह ही तो ईश्वर है.बीएस हमने इसे मानना छोड़ दिया.हमारे तमाम ऋषि मुनि विद्यार्थियों से पेड़ लगवाते,उसकी सेवा करवाते,उसकी पूजा करते.क्योंकि उन्हें पता था की इनके रहने से ही पृथ्वी पर जीवन है . हमने तमाम कामो को तो अपना लिया.उसको मानना ही धर्म समझने लगे,जबकि जो धर्म था वह भूल गए.
प्रकृति की सेवा करते हुए पृथ्वी की रक्षा करना ही तो धर्म था .अभी पलट कर अपनी आत्मा के अंदर झांकिए.आत्मा हमारी किस्से तृप्त होती है.शुद्ध जल से,शुद्ध हवा से और शुद्ध विचार से. विचार तो हमारे पास हैं मगर शुद्ध हवा और शुद्ध जल पर हमने अपने कर्मो से अशुद्धता की चादर उढ़ा रखी है.उठिए और यह चादर उतार फेंकिये. प्रकृति के सेवा कीजिय.इसका अनावश्यक दोहन मत कीजिये.पेड़ लगाइए.लगे हुए पेड़ को बचाइए.यह सामाजिक कार्य बाद में है,आध्यात्मिक पहले,क्योंकि प्रकृति के रहना ही तो आत्मा का रहना है. प्राकृतिक का खुबसूरत होना आत्मा के ऊपर उठने का संकेत है.लहलहाते जंगल,झरते झरने,साफ़ बहती नदियाँ संकेत हैं की यहाँ आध्यात्म है अन्यथा कुछ भी नही.
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