Saturday, August 24, 2019

जन्मष्टमी

अल्फ़ाज़ में पिरो दूँ,तो यह नामुमकिन है।संगीत में उतार दूँ, तो यह भी नही हो सकता।खूबसूरत रँगो से उनका अक़्स उतार दूँ,तो यह भी बस से बाहर है।ज़मीन पर प्रचलित हर कला का सहारा ले भी लूँ फिर भी कुछ न कुछ छुट ही जाएगा।

मेरे कान्हा में इतना कुछ है जिसको समेट पाना कला से बाहर है।मैं उनके मोर मुकुट को छूता हूँ तो चक्र छुट जाता है।गोपियों संग मुस्कुराहट को पकड़ता हूँ तो सारथी कृष्ण दूर चले जाते हैं।मक्खन से डूबे कान्हा के हाथ को देखता हूँ तो द्रोपदी के पास खड़े कृष्ण धुन्धला जाते हैं।सुदामा के लिए एकटक खड़े कान्हा को अपनाता हूँ तो अर्जुन को ललकारते कृष्ण बच के निकल जाते हैं।राजा केशव की आराधना पकड़ता हूँ तो कुरुक्षेत्र में लेटे कर्ण की परीक्षा लेने वाले कृष्ण दूर चले जाते हैं।

एक ही वक़्त में राधा की मुस्कान में मुस्कुराते कनहैया दिखते हैं तो कंस से जूझते कृष्ण बिछड़ जाते हैं।मैं अपने कान्हा को पूरा का पूरा समेटना चाहता हूँ मगर वह मुठ्ठी में बन्द रेत की तरह धीरे धीरे निकल जाते हैं।मैं मीरा के शब्द पकड़ता हूँ।सूर की डोर तो रसख़ान की गलियाँ देखता हूँ मगर मेरे कान्हा मेरे हाथों से हर बार निकल जाते हैं।मैं उनकी मुस्कान में डूब जाना चाहता हूँ।मैं भरम में हूँ की वोह एक कृष्णा हैं।मैं उस एक चेहरे में अपने हर तरह के चेहरे को देखता हूँ।मुझे कान्हा का चेहरा एक खूबसूरत धोखा प्रतीत होता है।वोह तो पानी है,जैसे देखो,वैसे कान्हा।सबके लिए सबके कान्हा।

मैं उनकी बाँसुरी में फंसी उंगलियो को देखता हूँ तो ज़मीन पर टिके अँगूठे को,पूरा का पूरा भरम।दुनिया को मुस्कुराने की वजहें कान्हा से ज़्यादा किसने दी हैं।मेरे कान्हा एक मासूम बच्चे से एक अनुभवी बुज़ुर्ग तक सबके दोस्त हैं।मुझे पता है मैं लिखता रहूँ,तो लिखता रहूँगा मगर कान्हा को समेट नही पाउँगा।आओ कान्हा इन।अल्फाज़ो को छोड़,आज मेरे साथ बैठो।मैं रोऊँ और तुम खड़े मुस्कुराओ।तुम्हारी मुस्कुराहट में मेरी हर परेशानी का हल है।

बस तुम यूँही मेरे साथ,हमेशा की तरह,हमदम रहो।मेरे कान्हा। मैं तुम्हे वृंदावन से बहुत दूर यहाँ बेचैनी से याद कर रहा हूँ,बस एक प्रार्थना,इस पूरे भारत को कुरुक्षेत्र बनने से बचा लो क्योकि अब कान्हा तुम दोबारा तो नही आओगे इस ज़मीन को हरी भरी उपजाऊ करने। इसमे प्रेम भरने,मेरे कान्हा हमारी नफ़रत पर अपनी मुस्कान की सील लगा दो।चाहकर भी नफ़रत उस मुस्कान में दबकर दम तोड़ दे।मेरे कान्हा।आओ आज दिनभर साथ रहें,बड़े दिन बाद मिले हो।कहीं जाने नही दूँगा आज। जन्मष्टमी की अगली सुबह शायर हैदर अल्वी के इस शेर के सहारे बस यही तो मांगना है...

।। मुझे अपनी निगाहों के पास रहने दे।।
।। तू कृष्ण है तो मुझे सूरदास रहने दें ।।

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