Saturday, August 24, 2019

धरती की जन्नत

बड़े,ऊँचे, हवेली नुमा घरों में एक कमरा होता था,जिन्नात का कमरा । होता था या बना दिया जाता था,यह तो जिन्नात ही जानें ।
उस कमरें में इंसानों का जाना मना होता,उसके बारे में कुछ भी दरयाफ्त करना मना होता,कुछ जगह तो उसका ज़िक्र करना भी मना होता ।

ऐसे घरों में रहने वाले मिट गए,घर की दीवारें चिटख गईं, भारी भरकम छते भी ढह गईं और सबके साथ जिन्नातो वाला कमरा भी गिर गया । सब मैदान हो गया ।
वह जिन्नातो वाले कमरें की दीवारें किसी ज़ुल्म को खुद में दबाएं थीं । या उनमें उन घरों की करतूतें चूने में छिपी थीं । या उनकी छतों में झूलती चमगादड़ों की आवाज़ कहती थी कि यही वह मिट्टी है, जो तड़प कर इस घर को ढहा देने की दुआ मांग रही है । एक दिन ईश्वर का दिल पसीजा और उस जिन्नातो की कोठरी की मिट्टी की दुआ सुनकर सब मिट्टी में मिला दिया ।

अपने घर जैसा एक देश भी है, जिसकी ज़मीन का एक टुकड़ा जन्नत जैसा दिखता था,अब जिन्नातो की कोठरी की तरह बना दिया गया है । जहां आना जाना,जिसके बातें करना,सब मना है । पूरे  देश मे कहकहे लग रहे हैं, यहां सन्नाटा है । ठीक जिन्नातो वाली कोठरी वाला सन्नाटा ।
हम सबको पता है, हम सब सन्नाटे से डरते हैं । इसलिए दूसरी दूसरी बातों पर चीख रहें हैं । एकदूसरे से लड़ रहे  हैं । एक दूसरे का मज़ाक़ उड़ा रहें हैं ताकि सब कुछ हो,बस नज़दीक़ यह सन्नाटा न आए ।

जिन्नातो की कोठरी गवाह है कि जबरन लाए गए सन्नाटे ने एक रोज़ पूरे घर मे सन्नाटा करदिया था । जिन्नातो की कोठरी ढही तो ज़रूर थी मगर साथ ही ढह गया था,भरा, पूरा,हँसता, खेलता,घर....

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