Thursday, August 1, 2019

अहंकार टूटता आया है

जब हिटलर के लिए जर्मनी पलकें बिछाए था तब गोएबल्स को यह एहसास ही नही हो सकता था की उसे और हिटलर को खुद को मारना पड़ेगा ।अपने बीवी बच्चों को ज़हर देना पड़ेगा ।यह एहसास हो ही नही सकता था तब,जब सत्ता का ग़ुरूर जिस्म के रेशे रेशे से झलके ।

गद्दाफी कुछ भी रहें हों,उन्हें रत्ती भर एहसास नही था जो जनता उनको अपना सिरमौर मान चुकी हो,वह उन्हें जूतों से पीटती हुई मार डालेगी ।

यज़ीद और फ़िरऔन या कंस और रावण जब अहंकार में बोल रहे थे,तो कब इन्होंने सोचा था कि इनके महल की दीवारें चिटख चिटख कर गिरेंगी,जिनमे उनकी पूरी नस्ल दफ़न होकर तबाह हो जाएगी।इसी संसार में पीले पन्ने पलट कर देख लें की कैसे कैसे यहीं बादशाहों और नेताओं के कपड़े नोचे गए हैं ।उन्हें मारा गया है ।उनके गिरेबान में हाथ डालकर अहंकार की सत्ताएँ वापिस छीन ली गई है ।

सब कुछ हुआ है, होगा भी ।जो भी घमण्ड में चूर होकर अपने ही देश के लोगों के ख़ून चूस कर चीखेगा,उन्हें लड़वाकर सिंघासन पर ठहाके लगाएगा, उसका हश्र बुरा होना निश्चित है ।ख़ैर मनाए कहीं लाखों करोणों की तादात अगर भड़क गई,तो भागने का रास्ता नही मिलेगा ।

और आप मूढ़ों की तरह इतिहास के कथाएँ पढ़कर नाचिये मत ।देखिये कैसे इंसान ने दूसरे इंसान का हाथ पकड़ कर शिकार करना सीखा ।कैसे संगठित होकर भोजन की व्यवस्था की ।कैसे उँगलियाँ पकड़कर फ़सल उगाई,भाषाएँ पैदा की,तन ढक कर मन को खोला,यह सब समझ जाएँगे तब एहसास होगा की हर एक कितना ज़रूरी है ।
एक जैसे धर्म के लोग को इकट्ठा करके,एक ही जाति की फ़सल उगाकर जो भी नीम ओ बरगद के तमाम पुराने पेड़ काटकर बबूल की नौदहा बाग़ लगाना चाह रहें,वह अपनी ही सभ्यता को मिटाने का काम कर रहें हैं ।

यह जो भेड़ियों की तरह का हुल्लड़ सिर्फ अपने अपने का लगा रखा है ।इसे ही आने वाली नस्लें बरसाती मेढक के टर टर में बदलकर रख देंगी और बाद में यह टर टर के लायक भी नही रहेंगे ।इस ज़मीन पर वही चलेगा जो सबका होगा,जो सबकी फ़िक्र करेगा,जो सबके दुःख दर्द समझेगा ।बाकि सब भड़काने,बहकाने वाले अपने बुरे कल की कल्पना करके सुधर जाएँ ।वरना हमे डर है की कहीं यह भीड़ ,जिसे पीटने लूटने की आदत लग चुकी है, वह इनके आलीशान बंगले छीन न ले,चलती गाड़ियों से खींचकर इन्हें पीटने न लगे ।

यह सब होगा,यह ज़रूर होगा क्योंकि नफ़रत अभी पक रही है,अभी खौलेगी और उबाल भी आएगा ।यह उबाल उसे ही सबसे पहले जलाएगा,जिसने इसे उबालने की हद तक पकाया है।
आपस की नफ़रत खत्म नही की तो तुम्हारा भविष्य कुछ भी नही है ।सब यही ज़मीन में लड़ लड़ कर मिट जाओगे,आने वाली नस्लें याद करना तो दूर,खखार खखार कर थूकेंगी की तुमपर । मैं तो रोज़ वही बात करूँगा, जो आपके फायदे की है, अच्छी लगे या बुरी,मुझे गाली दें या दुआएँ,मुझपर फ़र्क़ नही पड़ता । बस अभी थोड़ा सा वक़्त है, मोहब्बत करलो,हर एक धर्म जाति वर्ग को थाम लो,वरना ईश्वर भी अपने दरवाज़े बन्द ही कर लेगा...

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