Sunday, April 12, 2020

जलियांवाला बाग

कुछ लोग थे जो चाहते थे की उनकी हर साँस पर पहरा न बैठाया जाए । चाहते थे की उन्हें उनके मुल्क में सरकार जब चाहे बिना वजह गिरफ्तार करने के घिनौने मंसूबे छोड़ दे । वह जानते थे की जिस दिन उनकी साँस पर पहरा बैठा दिया जाएगा उस दिन आज़ादी का ख्वाब चकनाचूर हो जाएगा । बिना वजह गिरफ्तारितयों को अगर मंजूरी मिल जाएगी तो शासक ज़ुल्म की इंतहा कर देगा । निरंकुशता चरम पर होगी,यह कोई एक वर्ग नही,कोई एक धर्म ने बल्कि पूरा भारत सोच रहा था,वह भारत जो अपने अधिकारों के प्रति जाग गया था,जिसे केवल कर्तव्य की नींद की गोली देकर अब सुलाया नही जा सकता था ।

ज़ाहिर है यह रौलट एक्ट की कहानी थी,जिसके खिलाफ महात्मा गाँधी अपने साथियों संग जूझ रहे थे । इसी कड़ी में उनके अहम साथी और आज़ादी की लड़ाई के तमाम हीरो में से एक डा सैफुद्दीन किचलू और डा सतपाल गिरफ्तार कर लिए गए । इन्हें गिरफ्तार करके कहाँ रखा गया किसी को पता नही,अजब बेचैनी का माहौल । स्वर्ण मन्दिर के पास ही एक जगह इसका विरोध रखा गया । लोग अपने लीडर्स की रिहाई और काले कानून को तोड़ डालने के लिए इकट्ठे होने लगे । उस जगह का नाम था जलियाँवाला बाग़ 

करीब बीस पच्चीस हज़ार लोग जलियाँवाला बाग़  में इकट्ठे हुए और उनकी मांग थी की बिना शर्त डा सैफुद्दीन किचलू को रिहा किया जाए । दिनभर चले इस धरने को रोकने के लिए ब्रिगेडियर डायर को भेजा गया  ।जब शाम हो चली तो डायर सैनिक लेकर जलियाँवाला बाग़  की तरफ चल पड़ा । यह ऐसी जगह थीं जहाँ से निकलने का एक ही रास्ता था । वहीं उसी रास्ते पर फ़ोर्स लगाकर अन्धाधुन गोलियां चलवा दीं । देखते ही देखते पूरा मैदान लाशो में बदल गया ।  हम यह नही कहेंगे की तुम इसे सोचकर दर्द से चीखने लगो ।न कहेंगे की बहुत अफ़सोस करो । बस इतना कहेंगे की जलियाँवाला बाग़  को भूलो मत । देश लम्बे वक़्त से जो मांग कर रहा था की अँगरेज़ उससे जलियांवाला बाग के लिए माफ़ी मांगे । आखिर ब्रिटेन ने देश से जलियाँवाला बाग़ कांड के लिए माफ़ी मांग ली । कैमरून 2013 में ही इसकी भत्सर्ना लिखकर गए थे,जिससे उनके माफी मांगने का रास्ता बना ।

अब सोचिये की जो लोग शहीद हुए थे उस दौर में,वह भी किसके लिए,हमारी आज़ादी और डा सैफुद्दीन के लिए । एक मैदान के अंदर उन्होंने शहादत तो चुनी मगर धर्म के नामपर बँटना  नही चुना । लाशो में बिखर जाना तो पड़ा मगर दिल ओ दिमाग से एक होना चुना । वह जो जलियाँवाला बाग़ में खून बहा था वह हिन्दू,सिख,मुसलमान का नही था ,असली भारत का खून था । जिससे तड़पकर पूरा देश एक हुआ था । हम कितने बेगैरत लोग हैं जो जरा जरा से फायदे और बहकावे में आकर आपस मे बंटने लगते हैं । वह कितने घिनौने और देशद्रोही लोग हैं जो हिन्दू और मुसलमान को नफरत में बाँटकर अपने लिए चमकता रास्ता बनाते हैं । हम क्यों नही कहते की हम डा किचलू और डा सत्यपाल के लोग हैं । जलियाँवाला बाग़ में शहीद हुए खून की उपज हैं हम भारतीय । 

आजका दिन याद रखो या भूल भी जाओ मगर यह हमेशा याद रखना जो भी,हाँ जोभी हिन्दू और मुसलमानों को बाँटने की बात करे,वह जनरल डायर के लोग हैं । जो भी अली और बजरंगबली में फर्क करके आपस मे नफरत करके चलने को कहे वह डलहौजी के लोग हैं । जो भी केवल हिन्दुओं को कोसे या केवल मुसलमानों को कोसे वह सांडर्स के लोग हैं । कुल मिलकर यह वही लोग हैं जो आज़ाद भारत का ख्वाब नही देखते थे,बल्कि गुलाम भारत का ही ख्वाब देखते थे । बस फर्क इतना था की देश इनके हाथ का गुलाम बन जाए, इनका यह ख्वाब इस देश के संविधान ने चकनाचूर कर दिया ।

जलियाँवाला बाग़ सामने रखो और हमेशा सतर्क रहो । पता नही कब कौन जनरल डायर बनकर साथ मिलजुलकर प्रेम से चलने वालों को लाश का ढेर बना दे । जलियाँवाला बाग़ में हुए हर शहीद के सामने सर झुकाकर कहता हूँ की आपके ही रक्त से उपजे हुए आजाद भारत का नागरिक हूँ । अपनी आखरी साँस तक आपके दिए एकता,प्रेम,न्याय,भाईचारा और सहिष्णुता जैसे मूल्यों की रक्षा करूंगा । सभी शहीदों को नमन,अपनी शहादत हमारे लिए एकजुट रहने की मशाल है, जो सदा जलती रहेगी
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