Sunday, April 26, 2020

मस्जिद और कोरोना

जो भी अब से पहले सालों में कभी भी रमज़ान में जामा मस्जिद,दिल्ली गया है, वह उसकी उन दिनों की रौनक़ को भूल नही सकता ,दिन रात ज़बरदस्त भीड़ । मगर अब देखिए,एक सन्नाटा पसरा है । वह मस्जिद जो कभी खामोश नही रही,हर हलचल की गवाह बनी,हर आंधी का सामना किया,बंटवारे में बाहर होकर भागते हुए लोगों के लिए छत बनी तो कभी इमरजेंसी में अपनी सीढ़ियों से चीखकर लोकतंत्र की बहाली की दुआएँ करती,आज बिल्कुल खामोश खड़ी है ।

क्या यह खामोशी फ़िज़ूल है, हरगिज़ नही,यह खामोशी गवाह की जब हम दुनिया की एक भयँकर बीमारी कोरोना से जूझ रहे थे,तब रमज़ान में आबाद रहने वाली यह मस्जिद अपने सबसे भरे दिनों में खुद को खाली रखकर फिर एक योद्धा बनी खड़ी है । इसकी खाली सीढ़ियां, सन्नाटे से भरे बरामदे गवाह हैं कि कोरोना में कितना बड़ा त्याग किया है जामा मस्जिद ने,उसमें जाने वालों ने आज एक मिसाल कायम की है ।

आज भारत के हर धर्म ने अपने अपने स्तर पर कोरोना के लिए ज़बर्दस्त मुकाबला किया ।।प्राचीन मंदिरों ने दरवाज़े बन्द किये,मस्जिद और मज़ारों ने  अपने दर ओ दीवार वीरान कर लिए,गिरजाघर और गुरुद्वारों ने खुद को समेट लिया,सबने मिलकर मुकाबला किया मगर कुछ लोगों को मुट्ठीभर ही लोग दिखाई देते हैं, जिनको वह चीख चीख कर बताते हैं कि देखिये इन धार्मिक लोगों को,लॉकडाउन तोड़ दे रहें । 

130 करोण की आबादी हैं हम,कुछ लोग होंगे जो गम्भीरता नही समझ रहें,कुछ हैं जो धर्म की आड़ लेकर निकल रहे होंगे मगर आप देखिए,एक बहुत बड़ी आबादी खुद को क़ैद किये हैं । महीनों से क़ैद,क्या इसकी कोई अहमियत नही है ।

क्या जामा मस्जिद की खाली सीढ़ियों की कोई अहमियत नही है । हमारा और दूसरों का घरों में महीनों से बन्द रहना कोई अहम काम नही है क्या,कुछ लोग होंगे जो गलती कर रहें मगर क्यों हम सबको कठघरे में खड़ा करते हैं । क्यों नही हम आँख खोलकर उनको देखते हैं, जो जूझ रहे हैं ।

मेरा सर श्रद्धा से झुक जाता है मुसलमानों के सामने,जब उनकी खाली मस्जिदें देखता हूँ,तराबी के लिए उनको भागते हुए नही देखता,अफ्तार को घरों तक सीमित करते देखता हूँ,जो तीन जुमे की नमाज़ न पढ़ने पर खुद को मुसलमान नही मानते थे,उन्हें एक के बाद एक जुमा घर पर पढ़ते हुए देखता हूँ तो दिल उनके पाँव में झुका चला जाता है ।

नवरात्र,बैसाखी,सब तो गुज़रते देखा,कन्या पूजन को यूँ सन्नाटे में बीतते देखा,मंदिरों की घण्टियों को खामोश टँगी देखा,शाम को लगने वाली श्रद्धालुओं की क़तारों को खत्म होते देखा, बताओं इनके सम्मान में झुकूँ या न झुकूँ ।

हम फिर कह रहे कि कुछ मुट्ठीभर लोग गलतियाँ करते होंगे मगर आप मक्खी तो मत बनिये की ढूंढकर सिर्फ गन्दगी पर बैठिए । सिर्फ कमियों को उछालिये और असंख्य लोगों की कुर्बानी भुला दीजिये । मधुमक्खी बनिये,ढूंढकर अच्छी चीजों पर बैठें,उनका ज़िक्र करें और शहद बनाए ।

तब्लीगीयों को कितना कोसा गया,जेहादी,आतंकवादी न जाने क्या क्या नही कहा लोगों ने मगर अब कोई उनके प्लाज़्मा दान करने को,खून देने को नही देखता है । सैकड़ों तब्लीगी अपना खून और प्लाज़्मा दे रहें,कोरोना मरीजों को ठीक करने के लिए मगर यह हमें नज़र नही आएगा क्योंकि हम मक्खी हो चुके हैं ।

हम मानते हैं गलतियाँ होती हैं, इंसान ही हैं, हम सब,गलतियाँ होंगी अगर गलती नही करेंगे तो देवता हो जाएँगे । अगर हम वाक़ई इंसान हैं, तो हमे गलतियाँ भुलाकर उनकी अच्छाइयों को भी देखना चाहिए ।

रमज़ान में जामा मस्जिद की खामोशी और अधिक पवित्रता का एहसास दे रही है, तमाम मंदिरों में पसरा सन्नाटा और आध्यात्मिकता का बोध करवा रहा है । यह सारा त्याग याद रखे जाने लायक है और इसका सम्मान भी करना चाहिए । यह बता रहें कि हम अंदर से बहुत अंदर से आज भी एक ही हैं, मानवता के लिए एक हैं ।
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