अभी दो तीन दिन पहले लखनऊ में अपोलो हॉस्पिटल जाना हुआ था । पूरे एक महीने बाद घर से बाहर कदम रखा,रास्ते मे दो तीन जगह पुलिस मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी कर रही थी । रास्ते भर हम खाली सड़कें,सूने पार्क और सन्नाटे में डूबे रिवर्ट फ्रंट और मुँह बाए खड़े होटल्स को देखते रहे । उन स्कूलों पर भी नज़र गई जिनके बाहर से निकलना दुश्वार रहता था,इतनी भीड़ होती थी मगर अब सन्नाटा ।
सब कुछ पहले जैसा ही था,बस नही रह गए तो लोग । यानि सब है बस बहार नही है, यह बहार ही तो इंसान हैं । जो सड़के गुलज़ार थीं, जो पार्क चहकते थे,जो होटल दमकते थे,जो स्कूली इमारतें बात करती थीं, सब खामोश थीं, जानते हैं क्यों,क्योंकि इनमें अब इंसान ही नही रह गए,यानि इनकी आत्मा नहो रही ।
जब अपने शहर की इंसानों से खाली तस्वीर को देखिये,तब सोचिए कि इंसान कितना जरूरी है । बिना इंसान के सब बेजान है, बेरौनक है । पृथ्वी बाकी ग्रहों से इसी लिए सुंदर है क्योंकि इसमें इंसान के पाँव टिकते हैं ।
जब आप इंसान से उसके धर्म,जाति या क्षेत्र के आधार पर नफरत करते हैं और चाहते हैं यह सब खत्म हो जाए,तब आप अपने अंदर बाहर ऐसे ही सन्नाटे को तो दावत दे रहे होते है । सोचिए इंसान कोरोना से घरों में कैद है, सड़के,पार्क,ऑफिस उस इंसान की आहट पाने को बेचैन है, जो सालभर उनके सीने पर मूंग दलता है । होटल,पार्क,स्कूल सब मुँह लटकाए एक अदद इंसान को देखने को बेताब हैं, क्योंकि वह जानते हैं, उनकी रौनक तो इंसान से ही है । इसपर भी बहुत से मूर्ख इंसान की अहमियत नही समझ रहें और घर बैठे अपनी तरह न दिखने वाले इंसानों पर ज़हर उगलने को बेताब बैठे हैं । यह मूर्ख ही हैं, जो सामने दिख रहे सन्नाटे में भी अपने लिए सन्नाटे की भीख माँग रहे हैं ।
सब कुछ इंसान बिना फीका है, इस अहम सन्देश को समझिये और इंसान को बनाए रखने पर काम कीजिये । मैं ज़िन्दगी भर अपने शहर लखनऊ पर तारी बेबसी,मायूसी और बेरौनक आँखे नही भूल पाऊँगा क्योंकि हमने अपने शहर को बहुत चहकते,मुस्कुराते और ठहाके मारकर लोटपोट होते देखा है । मुझसे उसकी इंसानों से खाली बेचारगी नही देखी गई,आँसू भर आए आँखों में की क्या अब भी लोग नही समझेंगे की बहुरंगी इंसान कितने ज़रूरी हैं । मुझे इंसानों से खाली इमारतों,सड़को,स्कूलों की तस्वीरें कचोटती हैं । मुझे तो भीड़ भाड़ से भड़ी सड़कें ज़्यादा आकर्षित करती हैं, क्योंकि उनमें मेरे जैसे असंख्य इंसान चल रहे होते हैं ।
ईश्वर से प्रार्थना की कोरोना संकट जल्द से जल्द खत्म हो । हमारे वैज्ञानिक इसका तोड़ निकाल लें और हम एक बार फिर रिक्शों पर लदे बच्चों को रोते हस्ते स्कूल जाते देख पाएँ । लॉकडाउन में भी जो इंसान की अहमियत न समझ सकें उसके अंदर तो इंसानियत वैसे भी संदिग्ध है । सभी इंसानों से मोहब्बत करना सीख लीजिये वरना बहुत अकेले रह जाएँगे, इतना अकेले की बहते हुए आँसू देखने वाला भी कोई नही होगा,आँसू पोछना तो दूर की बात...
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