Saturday, April 4, 2020

किसे सुधारें

मुसलमानों से सुधरने के कहो,उनसे कहो कि अपनी कमियाँ दूर करें । अपने रसूल से सीखें कि तरक़्क़ी, इल्म और इंसानियत कैसे आती है । नई तालीम को अपनाएँ, तरह तरह की भाषाएँ सीखें,दूसरी संस्कृतियों को समझें । जब यह बात करो,तो मुसलमान काटने दौड़ते हैं कि सब हम ही सीखें । हमपर अत्याचार की हद है कि मेरी सुनवाई न सरकार में है, न कोर्ट में न समाज में, और शिकायत भी हमसे ही है । हमारी यूनिवर्सिटी तहस नहस की जाती है और आप हमको पढ़ने को कहते हो । कुछ मुसलमान मेरे मुँह से निकले लफ्ज़ को सुनकर ज़ुबान का खतना कराके हमें चुप करा देते हैं । 

हम हिंदुओं की तरफ घूमते हैं कि भाई अपने धर्म का मूल प्रेम और सहिष्णुता को खुद में कम मत होने दो । शिव जी की तरह हर जाति,धर्म,वर्ग से प्रेम करो । तुम्हारी सहिष्णुता ही संसार मे तुम्हारी पहचान है, इसकी कमी मत होने दो । खुद की कमियों को सुधारो,तुम तो कम से कम अपने अंदर नफरत को मत दहकने दो । फिर कुछ हिन्दू  काटने दौड़ पड़ते हैं कि हज़ारों साल से हम ही सहिष्णुता को ढोए । इकतरफा प्रेम हम ही दिखाएं । बड़े भाई की सारी जिम्मेदारी हम ही निभाएं । इनके सहयोग के अपेक्षा भी न करें । अब नही होगा,अब हम जाग गए हैं । आप भी चुप हो जाएं,अभी तो आपका सम्मान कर रहें,नही तो...हमारी ज़ुबान पर यहाँ भी तलवार चला दी जाती है ।

अब हम रुख करते हैं, नास्तिकों की तरफ । भाई तुम तो कम से कम दूसरों को नीचा मत समझो । हर एक को जाहिल कहने के लिए मत बिलबिलाओ । धर्म का रूप आज भले ही गलत हो मगर पहले यह एक विधान की तरह ज़रूरी था । इसने हज़ारों साल इंसान को मानवता के सूत्र में बांधे रखा है ।।दुनिया की तमाम बुराई का ठीकरा धर्म पर फोड़कर निकलना सही है । किसी धार्मिक व्यक्ति से तुम तो नफरत न ही करो,तुम तो इंसान का अपग्रेड वर्ज़न हो,तुम्हारे अंदर पुरानी बुराई तो नही होनी चाहिए । नास्तिक हम पर झपट पड़ते हैं, आ गए धर्म के वक़ील । करो वक़ालत अफ़ीम की,तुम तो अफीम को भी दवा बनाकर पेश कर दोगे । अरे यह धार्मिकों का नँगा नाच पूरे संसार ने खूब देखा है, अब हम नही देखेंगे । इनको खत्म ही होना होगा और आप,अब चुप हो जाएं,आपके शब्द ही अभी तक हमे भी उलझाएं थे,हमे तो लगता है, उनसे पहले आप जैसी ज़ुबान को खामोश करना चाहिए... यहाँ से भी हम भाग खड़े होते हैं ।

सबसे भागकर नववामपंथी गांधीवादी जीवों के बीच गया । यह मन मे मार्क्स और ज़ुबान पर गाँधी लिए खड़े थे । इन्हें पता था कि गाँधी के नाम से जब संघ बन्द दरवाज़ा खोल सकता है, तो हम भी खोल सकते हैं । रटने लगे गाँधी गाँधी, हमे भी धोखा हुआ । हमने कहा दोस्तों गांधी की तरह चलने का वक़्त आ गया है । अहिंसा,प्रेम और सत्य हमारे अस्त्र होंगे । हम धर्म को अपने हाथ मे लेंगे । सुबह शाम ईश्वर से प्रार्थना होंगी और हमारा सूत्र होगा,दुश्मन को बर्बाद नही करना है, बल्कि जीतना है । भाई लोग हम पर भड़क उठे । यह क्या सिखा रहे हो,हमने कहा गाँधी । यह गाँधी नही चलेगा, हमारा वाला गांधी चलेगा, जो दुश्मन को काट डालेगा । जिसे हिंसा के अहिंसा ओढ़कर सिसकना नही होगा । हम कष्ट झेलेंगी नही,बल्कि दुश्मन के कष्ट के दिन शुरू होंगे । रही बात धर्म की तो यह दक्षिण पंथ की तरफ जा सकता है, इसलिए इसे हम।पसन्द नही करते और प्रार्थना तो हम केवल अपनी महबूबाओ से कर सकते हैं, ईश्वर विश्वर से नही,निकलिए आप उससे पहले आपके अंदर का गाँधी मारा जाए ।

भागकर हम कमरे में घुस गए । खुद तय किया कि दुनिया जाए भाड़ में,हमे अपने आप को सुधारना है, खुद की कमियां दूर करनी है । शीशे के सामने खड़ा मैं कह रहा था आज से खुद पर काम शुरू,खुद को सुधारेंगे हम । तभी शीशे से आवाज़ आई, आ गए चिलगोज़े । हमे अच्छे से पता था तुमसे कोई तो सुधरेगा नही,आखिर में खुद पर ही लौटोगे । अबे जब खुद पर ही लोट पोट कर लौटना था,तो कहे समाज की चिंता में सिंगल चेचिस रह गए । मेरी सुनो,यह ख्याल भी खुद से निकाल दो और पेशाब करके सो जाओ । तुम भी नही सुधरोगे,कल से फिर लग जाना वही ढपली वही राग लेकर,प्रेम,सहिष्णुता,त्याग,समर्पण,संवेदना, सत्य,सहयोग । शीशा चीखता हुआ,हम पर टूट जाता कि हम भी बिस्तर पर गिर गए,धड़ाम से....
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