Friday, April 10, 2020

कस्तूरबा

इस जगत में गाँधी जैसी वैचारिक आंधी पर जिसने काबू पाया,वह हैं केवल कस्तूरबा । गाँधी को अपनी प्रतिज्ञा से जिसने एक इंच भी इस संसार मे खिसकाया है, वह हैं केवल कस्तूरबा । जो इकहरा शरीर दुनिया की सबसे बड़ी हुक़ूमत ब्रिटेन की महारानी के सामने भी अपने उसूल पर टिका रहा,वह लरज़ा भी तो केवल कस्तूरबा के आगे ।  गांधी के बनने की साक्षी,उनके अन्तर्द्वन्द को देखने की साक्षी,उनकी गलतियों को बर्दाश्त करने वाली और अच्छाइयों पर रीझ जाने वाली काया का नाम है, कस्तूरबा ।

आज कस्तूरबा का जन्मदिन है,गाँधी होते तो घर मे लगे फूल पत्तियों से और कुछ मीठा बनाकर कस्तूरबा को रिझाते,शरारत करते कि तुम्हारा बुढ़ापा और जन्मदिन,कस्तूरबा मीठा खाने को लपकती तो कहते,देखो कितने लोग आज भी भूखे हैं, कस्तूरबा मुँह मोड़ लेती,गांधी फिर लपक कर उन्हें खिलाते,यह मोहब्बत ऐसी मोहब्बत थी,जो दुनिया के महापुरुषों में कम ही देखने को मिलती है ।

गाँधी अपनी कस्तूरबा को बराबर बैठाना चाहते थे,कस्तूरबा थीं कि हमेशा सीख सिख कर बराबरी पर बैठ जाती,जहाँ गांधी अनिर्णय की स्थिति में होते,वहां कस्तूरबा गांधी को निर्णय पर ले आती ।

बच्चों को पालना,उनके दर्द को सहना,उनकी पढ़ाई और उन्नति की फिक्र साथ ही गांधी की अनिश्चित ज़िन्दगी से तालमेल बैठाना और आज़ादी की लड़ाई भी लड़ना,जेल जाना और साथियों की फिक्र भी करना,जैसे गांधी बनना असम्भव है, ठीक वैसे ही आज कस्तूरबा बन पाना भी असम्भव ही है ।

बिल्कुल भी पढ़ी लिखी नही,अंग्रेज़ी क्या,हिंदी ही नही आती,साउथ अफ्रीका अकेले दो छोटे बच्चों के साथ चल दीं, अपने गांधी के बुलावे पर,इतना लंबा सफ़र, बच्चे और बात करने की समस्या,उसपर भी जब जहाज़ रुका तो गाँधी लेने नही आ सके,मिले हुए पते को ढूंढकर उनतक पहुँची,फिर गांधी का ऐसा सहारा बनी की दुनिया ने पहला गांधी आश्रम देखा । महात्मा गाँधी के हर आश्रम की वह जान थीं, चाहे फीनिक्स आश्रम हो,चाहे साबरमती,चाहे चंपारण,चाहे सेवाग्राम । सबकी रूह,सबका आध्यात्म कस्तूरबा ही थीं । पोरबंदर और राजकोट से गाँधी के साथ चली कस्तूरबा ज़िन्दगी के हर उतार चढ़ाव देखती आगा खां पैलेस में अपने गाँधी के सामने ही आखरी सांस लेकर संसार से विदा हो गईं । गांधी रोए,कस्तूरबा को नहलाया और उसी आगा खां जेल में थोड़ी सी लकड़ियों पर सुला कर शरीर को उसके अंतिम गंतव्य तक पहुँचाया । कस्तूरबा चली गईं और दुनिया की नज़र में समूर्ण गाँधी, अपनी नज़र में अधूरे रह गए ।

आज बा का जन्मदिन है । किस्सों की भरमार है, उनका हर कदम एक किस्सा था,एक सबक था । जो सन्देश जीवनभर कस्तूरबा ने दिया,वह था,जज़्बा,पढ़ाई लिखाई भले न हो,स्वस्थ शरीर भले न हो,परिवार का सुख भले न हो,दौलत भले न हो,अच्छा खाना भले न हो,कपड़े भले न हो,मगर प्रेम और स्नेह के साथ दिल मे जज़्बा हो कुछ करने का तो पहाड़ भी दरक जाते हैं । कस्तूरबा ने यह करके दिखलाया । आज होना तो यह चाहिए बा के सामने श्रद्धा और कृतज्ञता से झुक जाना चाहिए,मगर लोगों को मालूम तो हो,उन्हें बताइए ताकि अपनी बा के साथ साथ महान कस्तूरबा को नमन तो कह सके,सलाम बा ।
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