Sunday, October 2, 2016

कर्बला

क्या अब मैं तुम्हारी आँखों में आँसू लाने के लिए उनकी शहादत को लिखूँ।या कहो तो तुम्हारे मुर्दा दिलों में जुम्बिश के लिए उनके ख़ून के इक इक क़तरे को अल्फ़ाज़ दूँ।मैं तो यह भी नही कर पा रहा की तुम्हारे नफ़रत से भरे दिलों को इंसानियत की हवा दूँ।तुम्हारे घर की चौखट पर खड़ी सच्चाई,मोहब्बत और इंसानियत को किसने किसने ज़िंदा रखा,तुम्हे तो यह तक नही पता।
तुम्हे तो यह भी नही सुनना पसन्द की यह जो हक़ है।यह जो सच्चाई है।यह जो सही है।यह जो धर्म है।यह कैसे आज तुम्हारे सामने,तुम तक पहुँचा।
कभी दिल करे की ज़ुल्म के ख़िलाफ़ कैसे खड़े होते हैं तो कर्बला का रुख करना।जब लगे की तुम्हारे हक़ को तुम्हारे सामने कुचला जा रहा हो,तब कर्बला की तरफ देखना।जब ज़ालिम का ज़ुल्म तुम्हारी बच्चियों पर उतरे तब कर्बला को देखना।हाँ तब भी कर्बला को देखना जब तुम टूटने लगो।जब तुम्हारे अपने तुम्हे हक़ बात कहने,करने से रोकें।जब तुम्हारे अपने लोग ख़ुदा की राह के काँटे बनने लगें, तब तुम्हे कर्बला रास्ता दिखाएगा।
छः महीने के प्यासे बच्चे की गर्दन में धँसे तीर के दर्द और हक़ पर मिटने की ललक को महसूस कर पाना तो सोचना यह जो गुलदस्ता तुम्हे मिला है, यह है क्या।कभी दुनियाँ में ऐसी लड़ाई की जीत देखी है जिसमे 72 बनाम हज़ारों की तादात हो और 72 में से ज़्यादातर शहीद होकर भी,आज भी ज़िंदा हों।उन 72 के लश्कर का अमीर शहीद होनेपर भी करोणों दिलों,दिमाग में ज़िंदा हों।
कभी मज़हब,फ़िरक़ा,पार्टी,विचार,सियासत से फुर्सत मिले तो हुसैन को पढ़ना।कर्बला को देखना।हर ख़ून के क़तरे पर नज़र रखना तब तुम्हारे दिल को भी मज़बूती मिलेगी।दिल की बुज़दिली,नफ़रत खत्म होगी और मोहब्बत,इंसानियत के साथ तुम भी ज़ुल्म के ख़िलाफ़ और ज़रूरतमंद के साथ खड़े हो पाओगे।
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