Saturday, October 29, 2016

दीपोत्सव

ज़मीन बेचैन थी।यह बेचैनी एक दिन की नही थी।बहुत से सालों की थी।लोगों के दिल धड़क रहे थे,कभी तेज़ तो कभी धीरे।घर घर से खुशबूदार खानों की वजह से पूरा इलाका महका हुआ था।बच्चे ख़ुशी में खेल रहे थे,उन्हें खुशियो की वजह नही पता थी।औरते रह रहकर गा रहीं थीं।उनके गानों में खनक थी।आदमी धान की फसलों के संग ठहाकों में थे।
मेरे राम अयोध्या की माटी पर पाँव रखने जा रहे थे।सरयू में उथल पुथल थी।आज सरयू खुद घी का दिया बनने को तड़प रही थी।अयोध्या की माटी का लाल आज लौट रहा था।वही लाल जिसने माटी की लाज रखी थी।जिसने माँ जैसे अल्फ़ाज़ को इज़्ज़त बख्शी थी।
मेरे लिए दीपावली लक्षमी का आना नही है।मेरे लिए मेरे राम का आना दीपावली है।मर्यादा पुरुषोत्तम राम का आना दीपावली है।माँ के कहने पर फ़रमाबरदारी  से चौदह साल काँटों भरे जंगलो में ज़िन्दगी के अहम् हिस्से को गुज़ारने वाले का वापिस आना ही दीपावली है।माँ चाहे सगी हो या सौतेली,मगर माँ शब्द को अहमियत देने का पर्व दीपावली है।
मुझे पता है मेरे राम दीपो में तो होंगे मगर लोगों की लक्ष्मी की चाहत के आगे कमज़ोर होंगे।
मेरे राम के तलवों में लगे काँटे पर जब अयोध्या की माटी लगेगी आज,वोह छण मेरे लिए दीपावली है।मेरे राम के चेहरे पर जँगल की उतरी थकान को जब सरयू धोएगी,वोह है दीपावली।जब मेरे राम को उसका भाई गले से लगाकर ज़ार ज़ार रोएगा,तो वोह है दीपावली।मेरे राम का,हाँ मेरे का होना ही दीपावली है।सिर्फ यही एक वजह ही है की आज मेरी दीपावली है।आज मैं राम के संग अयोध्या की दहलीज़ को महसूस कर रहा हूँ।मेरी यही दीपावली है।दीपावली मुबारक उनको जिनके दिलों,किरदारों,ज़िन्दगी,ज़हन में हैं मेरे राम।

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