कुछ लोग सुबह से शाम तक सिर्फ डर बेच रहे हैं।उनकी दुकान में सिर्फ और सिर्फ डर है।यह डर कहीं न कहीं लोगों को कमज़ोर कर रहा है।
एक मुँह बोले एक्टिविस्ट थे,उन्होंने बोलना शुरू किया "साथियों,वक़्त बेहद बुरा है।हर तरफ अँधेरा है।आप समझ नही रहे हैं किस किस तरह की ताक़तें हमारे वजूद को खत्म करने पर तुली हैं और नही तो क्या क्या..."
अब इन्हें कौन बताए की यह तो आम सी बात है।सबको पता है की आने वाला वक़्त सही लोगों के लिए कठिन है।आने वाला क्या,हर दौर में सही लोगों को ही परेशान किया गया है।न हो तो इतिहास की किताबों को छान मारो।सुनिए एक एक्टिविस्ट को ख़ाली डर का पहाड़ नही खड़ा करना होता है।वोह सिर्फ आगाह करके फौरन रास्ते सुझाने और बनाने में लगता है।
एक एक्टिविस्ट लोगो को मज़बूत करता है।उन्हें हौसला देता है।उन्हें उम्मीद देता है।उनमे मौजूद मायूसी को खुद पीकर,उन्हें मुस्कान देता है।तभी तो वोह एक्टिविस्ट है।अब बताइये कोई इनसे कमज़ोर इंसान मिलकर जाए,तो वोह और डर जाए,घबरा जाए,टूट जाए,तो इनकी एक्टिविज्म का क्या फायदा।हाँ अगर इनसे मिलने के बाद उसे मज़बूती मिले,हिम्मत मिले,लड़ने की ताक़त मिले तब तो एक्टिविज्म को सलाम।मुझे पता है बहुत बड़ी तादात में एक्टिविस्ट बहुत बढ़िया काम कर रहे हैं।मगर मैं मुखातिब उनसे हूँ जो सिर्फ़ डरा रहे हैं।
मेरे एक्टिविस्ट साथियों जितना चाहे मेरी बातों को काटिये मगर इतना ख्याल रखिये की आपसे दूसरों को हिम्मत मिले नाकी डर।डर बेचना तो दूसरों का काम है।आपका काम डर को खत्म करना है।उठिये आपमें बहुत सी अच्छाइयाँ हैं, तभी आपने एक्टिविज्म को अपनाया है।आप लोगो को ताक़त दें।उन्हें रास्ते सुझाएँ।उन्हें बताएँ की वक़्त बुरा नही है हिम्मत से काम लें।हर शाम दोपहर के बाद शाम आएगी।वोह शाम ठण्डी ठण्डी हवा के झोखे से दोपहर की सारी तपिश का गुरूर तोड़ देगी।तुम हिम्मत और मुस्कुराहट के साथ इस भरी दोपहर का मुकाबला करो।तुम्हारी मुस्कुराहट ही सूरज को चिढ़ा देगी।यक़ीन मानो तुम्हारे तपिश से सूखे होंटो पर शाम की नरमी ज़रूर आएगी।
ऐ एक्टिविस्ट साथियों।डर को रोको।डर को खत्म करो।डर को मिटाने में लगो।यही तुम्हारा,हमारा,एक्टिविज्म का फ़र्ज़ है।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Thursday, October 27, 2016
डर के आगे और डर है।
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hafeezkidwai
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