करीब 450 स्टूडेंट,उसमे सबसे आगे की सीट पर हम।मास कॉम का इंट्रेंस एग्ज़ाम ऊपर से सबसे पहला सवाल ही हमे नही आता था।मैं चकर मकर पूरा हॉल देख रहा था।नज़र पेपर पर बिखरे सवालों की जगह, दिवार के कोने में लगे जाले पर,मकड़ी और तितली की लड़ाई पर टिकी थी।तुमने दूर से मुझे देखा।झट से मेरे पास आई और सवालिया इशारे में पूछा,लिख क्यों नही रहे हो।
हमने बेशर्मी से कहा,पहला सवाल ही नही आता तो क्या करें।तब तुमने कहा दूसरा करो,तीसरा करो,बाद के करो जो आता हो।मैंने समझाया,देखिये मैडम जिस चीज़ की शुरआत ही हमे नही आती, उसमे हम हाथ भी नही धरते।हाथ में लिया रजिस्टर मैडम ने सर पर मारा और कहा डायलॉग मत मारो ज़्यादा और हाँ मैडम नही,तस्मियां।नाम बताकर जाते जाते लम्बी सी ऊँगली से पहले सवाल के आंसर B पर इशारा कर गई।इस तरह मास कॉम की पहली गिरह खुली।
हमे क्या पता था की रेडियो आप ही पढ़ाएँगी।अक्सर खूबसूरत आवाज़ सुनकर मैं पूछ लेता की मैडम आप मुँह से ही बोलती हैं, तो आप मुँह फैला देती।तब मैं सकपका कर कहता,मेरा मतलब था की लगता है दिल से बोलती हैं।आप मेरे इन लफ़्ज़ों में अपने बुढ़ापे को बुनती हुई कहीं खो जाती और मुझे अपने दोस्तों से बतियाने का वक़्त मिल जाता।
कॉलेज में मेरे हर कदम पर सीसीटीवी की तरह उन्ही बड़ी आँखों वाली मैडम की नज़र रहती।तस्मिया मैडम आप हमेशा हम पर ही क्यों नज़र रखती हैं।सुधर जाओ,सिर्फ तस्मिया।तुम्हारा फोन नम्बर पा गई हूँ,ठीक कर दूँगी।मुझे लगा कहीं पैरेंट्स से शिकायत ना करें, मैं ध्यान से पढ़ने लगा।जब ध्यान लगाऊँ तो वोह सामने खड़ी हो जाए।बेतुके बेतुके जिंगल्स लिखवाएँ।स्टोरी करवाएँ।तबियत आजिज़ आ गई।एक दिन कहने लगीं की कल एक स्टोरी पर फ़ील्ड में जाना है,फ़ील्ड में नही जाओगे तो सीखोगे कैसे।हमने पूछा कहाँ।बोली रेजीडेन्सी।पुरानी इमारतों के रख रखाव पर स्टोरी करना,पढ़कर आना।हमने हाँ कहाँ और निकल गए।
पूरे पन्द्रह दिन कॉलेज नही गए।पुरानी इमारत तो वोह खुद थीं।पता नही कब ढह कर गिर जातीं।अगस्त की बारिश तो और डराए थी की कहीं किसी रोज़ फैल ना जाए।करती रहीं सैकड़ों कॉल, मैसेज,मेल मगर कोई जवाब नही दिया।पता नही कौन सी मिट्टी के दफ़न शेर बाहर ला रही थीं जिसकी पहली लाइन ही समझ न आए।अब उन्हें कौन बताए की यह नामुराद स्टूडेंट उनसे मिलने के बहुत साल पहले ही मजाज़ को पढ़ चुका था।
इश्क़ के भूत का ताबीज़ पहले ही गले में डाल लिया था।होगी तस्मिया की खूबसूरत आवाज़।रेडियो पर होंगे RJ तस्मिया के फॉलोवर मगर यहाँ मुझे मजाज़ की तरह सड़क पर नही मरना।मखमली आवाज़,मलमली चेहरा,दमकता किरदार कभी भी मेरी ज़ंज़ीर नही बन सका।बहनजी गलतफहमी में थी की जिस पर्चे का पहला सवाल मैं हल कर लूँ तो उसे मैं पूरा कर सकता हूँ।अर्रे मैडम दो सवाल के बाद फिर फस गए थे।अपने सब्जेक्ट में सबसे कम नम्बर देकर आपने रोकने की भरपूर कोशिश की मगर जुगाड़ ज़िंदाबाद।।।।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Saturday, October 15, 2016
आशिकी ग्यारहवीं
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