देखो चाहे जितना उड़ लो,हो बिलकुल ढक्कन।मैं तुम्हारी नौकरियों,तुम्हारी पढ़ाई,तुम्हारे हिलोर मारते वजूद पर रत्ती भर दिल नही धरता।तुम ओरगेनिक केमिस्ट्री के किसी हिस्से में पीएचडी हो तो क्या करें जब तुम्हे दूसरे इंसान का फ़र्क नही दिखाई देता।तुम जियोलॉजी के मशहूर प्रोफेसर हो तो बताओ इसपर हम क्या करें जब तुम भूगोल के फ़र्क को नही समझते।तुम इंजिनयरिंग करके दूसरे देश में झण्डे गाड़ रहे हो मगर यहाँ तुम्हारा दिल इतना बंटा हुआ है की तुम्हारी डिग्री में सीलन दिखती है।
मशहूर डॉक्टर हो मगर दिल में इतनी सड़ाँध है की मरीज़ यूँहीं मर जाए।तो तुम्हारी डिग्री का आचार डालूँ क्या।सरस्वती ने इतनी खूबसूरत कलम दी की जब चले तो कहानियाँ बिखर जाएँ, मगर क्या करें जब दिमाग में ज़हर भरा हो।तुम इंसान में अपना वाला ढूंढते हो।तुम्हे गर्भ त्रिशूल पर टँगा हुआ शौर्य का प्रतीक लगता है।तुम्हे काले झण्डे के नीचे सर क़लम होते जिस्म में मज़ा आता है।तुम्हे जलते हुए घर में कला का अदभुत चित्रण दिखता है।
एक मामूली सी बात है अगर तुम्हारे दिल में किसी दूसरे इंसान के लिए नफ़रत है तो समझ लो तुम्हारी डिग्री,तुम्हारी नौकरी,तुम्हारा वजूद ही फ़िज़ूल है।जो दिल मोहब्बत न फैला सके।जो दिल इंसानियत न बाँट सके।जो खुशियाँ न दे सके वोह सिर्फ सिर्फ दिल नही बल्कि सड़ा हुआ गोश्त का टुकड़ा है।जो धीरे धीरे बदबू तो बढ़ाएगा ही,कीड़े भी पड़ेंगे उसमें।
कुछ नही बिगड़ा है अगर शीशा देख के तुम्हे अपना चेहरा इंसान वाला लगे।तो उठो और इंसान बनों।मोहब्बत,इंसानियत,यूनिटी,तरक्की को थामो।यह दुनिया बेहद खूबसूरत है बस सबको सबकी तरह स्वीकार करो।आओ एक खूबसूरत भारत बनाए,ताकि दुनिया खूबसूरत हो।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Tuesday, October 18, 2016
लानत है
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hafeezkidwai
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