यह जो वाद है न यही सारे विवाद की जड़ है।जो जिस वाद का झण्डा लिए चिल्ला रहा है, उसमे उसी वाद की सबसे ज़्यादा कमी है।इनको लगता है की मेरा ही वाद सबसे बढ़िया है,बाकि तो जाहिल हैं।दूसरों को लगता है की उनका वाद बेहतर है, बाकि सब बुरे हैं।यही सोच इन्हें लड़ाए हुए है।
कोई भी वाद उतनी ही देर तक अच्छा है जबतक वोह किसी दूसरे को नुकसान नही पहुँचा रहा है।जैसे ही वाद के तलवों में ख़ून की चिपचिपाहट लगे,समझ लो यह वाद सड़ना शुरू हो चुका है।उससे पीछा छुड़ा लो।किसी भी वाद के इतने गुलाम न बनों, की तुम्हारा अपना दिमाग,तुम्हारा ही न रहे।वोह किसी वाद की गठरी बन न रह जाए।
थोड़ा सा अपने दिमाग की तहें खोलो।उसमे लगे ज़ंग को खुरचो।साफ़ करो।तब देखो अपनी नज़र से।मेरी मानो यह वाद कुछ वक़्त के बाद ज़ंग में बदल जाते हैं।दिमाग की नसों को सड़ा देते हैं।इनको समझो और अपने दिमाग को रफ्तार देकर बस आगे बढ़ो।आजकी मुश्किलें सुलझाओ।कल की मुस्कुराहट के बीज आज बो।अपने दिमाग को समझो।उसमे सबकुछ है।वोह सम्पूर्ण है, बस ठहर कर उसको देखो।अपने दिमाग पर बारीक़ निगह रखो।सब रास्ते खुद बखुद दिखने लगेंगे।
यहाँ मैंने हर बार वाद लिखा है, अपनी नफ़रत या मोहब्बत के हिसाब से उसके आगे जो भी सोच को जोड़ लें,बात सबके लिए समान ही है।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Monday, October 24, 2016
वाद
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hafeezkidwai
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