मज़हब नमक है।नमक अगर कम होगा तो नुकसान तो नही होगा,मगर आप फीके फीके लगेंगे।हाँ अगर यह ज़्यादा हो गया,तो यक़ीनन यह बदमज़ा हो जाएगा।दूसरी बीमारियाँ पैदा करेगा।आपको बिलकुल गला देगा।
मज़हब उतना ही अच्छा है, जितने से स्वाद आए।जितने से जिस्म की ज़रूरते पूरी हो सकें, बस।ज़्यादा तो पागलपन ही पैदा करेगा।आपको तो खत्म करेगा ही साथ ही दूसरों को भी गला देगा।
मज़हब नमक है से मतलब है की मज़हब ज़रूरी भी है।बिना इसके आप फीके हैं।आपमें अगर यह नही है तो बहुत से एहसास भी नही पैदा होंगे।बहुत से दूसरों के दर्द को आप पहचान भी नही सकेंगे।
नमक थोड़ा कम या ज़्यादा भी चल सकता है।मगर जब यह ज़रूरत से भी कम या ज़्यादा हो जाएगा तो नुकसान ही करेगा।अब यह मत पूछियेगा की यह ज़रूरत भर कितना होता है।अगर दिमाग के सारे हिस्से काम कर रहे हों,तो यह समझना आसान हो जाएगा की कितना मज़हब फायदेमंद हैं और कितना नुकसानदेह।
वैसे भी हर मज़हब के मूल कर्तव्य या फ़र्ज़ को देखेंगे,तो आपको लग जाएगा की वाक़ई यह नमक भर हैं।उसके बाद जुड़ी ज़्यादतर चीज़ें ही उसकी लिमिट को बढ़ा रही हैं।मैं कभी नही कहूँगा की तुम मज़हब छोड़कर यूँ ही भटको।मैं कभी नही कहूँगा की तुम नास्तिक बनों,नास्तिक कहना और होना में बड़ा अन्तर है,होने में बड़ी साधना है।शरीर की साधना।शरीर जिनसे सम्भलता नही,वोह नास्तिकता का झण्डा लिए खड़े हैं, उनके जैसा बनने को कभी नही कहेंगे।
अगर आप नमक भर मज़हब रखेंगे,तो यक़ीन जानिए आपमें मौजूद हर चीज़ का स्वाद आएगा।हर खूबी निखरेगी।हर खुशबू महकेगी।मगर जब यह ज़्यादा होगा तो सारी खूबियाँ नमक की भेट चढ़ जाएँगी।
मैं बता दूँ,नमक का काम सिर्फ इतना है की दूसरी खूबियों, अच्छाइयों को निकाल कर बाहर लाना।अपने जिस्म को देखिये।रूह को महसूस कीजिये और उसकी ज़रूरत भर नमक उसे दीजिये।यक़ीनन आपका जिस्म और आप बेमिसाल हैं।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Wednesday, October 26, 2016
मज़हब नमक है
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hafeezkidwai
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