Friday, October 7, 2016

इन्हें चुनाव मत कहो

दिल काँप जाता है जब जब चुनाव आता है।मैं नही चाहता की यह बार बार आए।यह जब जब आता है, तब तब मासूमियत चीख़ उठती हैं।जिस्म से बोटियाँ नोची जाती हैं।मज़लूम की हड्डी तोड़ी जाती हैं।तिनका तिनका जोड़कर बने आशियाने जलाए जाते हैं।जो जहाँ पैदा हुआ है, उसे उस ज़मीन से दूर जाने को मजबूर किया जाता है।त्यौहार भी सियासत की भेंट चढ़ जाते हैं।पाँच लोगों का जमावड़ा,इनकी रोटियां सेकने के काम आता है।मासूम का ख़ून चुनाव का रँग चोखा करते हैं।
ऊपर से फ़ूहड़ मज़ाक यह की जनता अपना नेता चुन रही है।नेता नही वहशी चुन रही होती है।जो कभी उनकी जलती झोपडी में पानी नही डालता।जो कभी गरीब की उधेड़ती खाल पर अपना हाथ नही रखता।या तो वोह घर जलाता है या तो जलते हुए देखता है।तुम्हे पता है यह जो चुनाव हैं, यह क्या लाते हैं अपने साथ।
यह अपने साथ ट्रकों भर भर कर मौत लाते हैं।वहशी दरिंदो के बीच अकेले कमज़ोर को तड़पते हुए,मरते हुए,बिखरते हुए वजूद का खेल लाते हैं।चुनाव का सबसे तेज़ असर मज़हब पर होता है।यह पूरे मज़हब को ज़हरीला कर देता है।यह इंसान को जातियों में बाँटता है।यह बच्चों और औरतो को निशाना बनाकर आदमियों को भेड़ के झुँड में तब्दील कर देता है।
तुम कहते हो इस चुनाव में अपना मुस्तक़बिल चुनो।अपना नेता चुनो।अपनी सरकार चुनो।दिल पर हाथ रख कर कहो की कैसे चुने।बेटों की लाश पर बाप कैसे किसी को चुने।बेटी के तन पर पड़े वहशी दरिंदो के नाखुनो के निशान नज़रअंदाज़ कर कोई माँ कैसे चुनाव में जाए।
सच बताएँ जो विश्वघोषित दंगाई हैं।नफ़रत से भरे हैं उनसे रत्तीभर डर नही लगता।न उन मानव भक्षकों से डर लगता है जिनकी माँ भी उन्हें पैदा करके शर्मिंदा होगी।हाँ डर लगता है जो इंसानियत की तरफ हैं मगर मेरी मौत पर खामोश हैं।मेरे छप्पर में लगी आग देख वोह कैसे पक्की छतों में सो जाते हैं।उनकी नींद देख डर लगता है।मेरी फटीचर हालत पर रोने वाले मेरे नेता अपनी महफ़िलों में कैसे मुस्कुरा लेते हैं।उस मुस्कान से डर लगता है।
सच पूछो तो दिल करता है यह चुनाव न आए।इस चुनाव में मेरे अपनों के चेहरे पर चढ़ी सफेद पुट्टी धुल जाती है।मेरे देखते देखते वोह हिन्दू-मुसलमान में बदल जाते हैं।जिसने कभी हमसे नही पूछा की तुम्हारी गली का मेनहॉल का ढक्कन खुला है या नही,वोह हमसे दूसरे मुल्कों के हालात सुनना चाहता है।यह चुनाव ही है जो मेरे मुस्कुराते हुए साथ वालों की मुस्कान में संकोच दे जाता है।
कोई चुनाव में बहे ख़ून का हिसाब नही देता।कोई नही पूछता इस महोत्सव में हमने इंसान को कितने हिस्सों में बाटां है।कोई नही बताता की तुम्हारे कुछ कुर्सियों के लिए हमने कितनो की चटाई छीनी है।मैं अब डरने लगा हूँ चुनाव से,बेहद।यह तबाही लाता है।यक़ीन न हो तो इर्द गिर्द रँग बदल रहे इंसान को देख लीजिये।दो कदम दूरी पर हैं वोह वहशी बनने की,बस।काश हाँ काश,एक बार सही से हमे आईना देखने की तमीज़ आ जाए।अपने अंदर छुपे इंसान और वहशीपन को देखने की समझ आ जाए।तब देखना यही चुनाव,निर्माण लाएंगे।©

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