तुम सही मुसलमान नही हो।आओ तुम्हे सही मुसलमान बनाएं।तुम देखो तुममे कितने गुनह शामिल हो रहे हैं।तुम्हारे किस कदम से तुम्हारा ख़ुदा नाराज़ हो रहा है।तुम्हारे रँग खेलने,गाना गाने,ढोल तमाशे में देखो इस्लाम नही है।तुममे दूसरे मआशरे की बुराइयाँ आ गई हैं।तुम हल्के हल्के बुत परस्ती तक जा रहे हो।तुम दूसरों में इतना घुल मिल रहे हो की तुममे मौजूद इस्लाम अकेला पड़ रहा है।आओ हम तुम्हे सही इस्लाम बताएँ।तुम्हे हर बहके हुए,गैर शरई, गैर इस्लामिक चीज़ों से बचाए।तुम जन्नत की ज़ीनत हो।यहाँ दुनियावी चकाचौंध में मत पड़ो।सही मुसलमान बनो।जिसका दिल सिर्फ मुसलमान के लिए धड़के।मैं तुम्हे सच्चा मुसलमान बनाऊंगा।
तुम कैसे हिन्दू हो।तुममे सनातन तो है ही नही।तुम मस्जिद के सामने भी कतार लगाए हो और मज़ार के सामने भी।तुम बाबर की औलादों को अपना समझ रहे हो।तुम इन आतताइयों,मलेच्छो के साथ उठ बैठ रहे हो।तुम्हारे हृदय में वास्तविक सनातनी संस्कृति लगातार दम तोड़ रही है।जिन्हें तुम्हे त्रिशूल पर टांग देना चाहिए उन्हें तुम अपना रहे हो।तुम्हारे धैर्य की परीक्षा बहुत हुई।तुम्हारी सहिष्णुता अब तुम्हारी कमज़ोरी बन गई है।उठो और अपनी वास्तविक संस्कृति और धर्म की रक्षा करो।हम तुम्हे एक सही हिन्दू बनाएँगे।जिसका हृदय,आत्मा और शरीर केवल और केवल हिन्दू होगा।
यह जो दोनों तरह के सही बनाने वाले गलत लोग हैं।इन्होंने ही जीना हराम कर रखा है।यह जो आपको सही मुसलमान और वास्तविक हिन्दू बना रहे हैं न,असलियत में आपकी खूबसूरत नसों में ज़हर भर रहे हैं।यह जो सही वाला कॉन्सेप्ट है न,यही सबसे गलत है।यह आपको दूसरे धर्मो,संस्कृतियों से अलग कर रहे हैं।उनकी खूबियों से किनारे कर रहे हैं दिलों में इतना फासला पैदा कर रहे हैं की आपको सामने वाला इंसान हर वक़्त गुनहगार और प्रत्येक दिन पापी अधर्मी नज़र आए।मैं नही कहता मैं सही हूँ।बस एक बार ठहर जाइये।थोड़े बिगड़े रहिये।पूरा सही मत होईये।आपके बिगड़ने से दिल संवरते हैं।आपका दूसरी संस्कृति के प्रति लगाओ,ईश्वर की मंशा का विस्तार है।आपकी दूसरे मआशरे की मोहब्बत आपके दिल को नरम करती है।मैं फिर कह रहा हूँ ऊपर की तरह सही मत बनिया।गलत ही रहिये।यक़ीन मानिये अब तक आप गलत थे तो धर्म पर थे।जबसे यह सही करने लगे तबसे आप अधर्मी हो गए।
बहकिये मत,धड़कते दिल आपका सहारा ढूंढ रहे हैं।मोहब्बत से उन्हें थाम लीजिये।थोड़े गलत भी हुए तो क्या हुआ।कम से कम दूसरे का दिल तोड़कर महापाप तो नही किया।किसी की रूह को नोचकर दोज़ख का रास्ता तो नही खोला।हल्का फुल्का एक दूसरे के साथ घुलमिल कर इंसान बने रहिये।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Monday, October 17, 2016
कुछ दाग़ महकते हैं
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hafeezkidwai,
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piece
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