Friday, January 6, 2017

आप हमारे जैसे हो गए

धीरे धीरे सुबह  होना फिर उस सुबह के साथ अलसाये लोग।हर मौसम को अपने मिजाज़ से अपनाता हुआ मेरा शहर।चाय जिसकी नसों में हरकत पैदा करे और फिर हरकतें नज़्म और गज़ल में बदल जाएँ ।तमाम रिवायत को जोङते हुए मेरा शहर तरक्की के साथ है।हमें खुशी है की हम लखनवी हैं ।
हमारी नस नस में जो शहर दौङता है वह है मेरा लखनऊ ।यहाँ के खमीर को लिखने बैठूं तो जिंदगी खर्च हो जाए।वैसे मालूम कर लीजिए इस रिवायती शहर नें दुनिया को सैकड़ों मिसाली काम दिए।यह दुनिया का अपनें आप में पहला ज़िंदा शहर है जिसने चिङियों से भी खेल के शौक पूरे कर लिए ।
मुर्ग ,तीतर,बटेर ,लवे,बुलबुल,लाल,कबूतर और तोते इन खेलों के गवाह हैं ।इनकी लङाईयां एक ज़माने में ऊफ़ान पर थीं ।तब दिल जुङे थे और मेरा शहर हर दांव पर खिलखिलाकर तो कभी ठहाकों में हंसता था।जानवर,चिड़िया न जाने क्या क्या लड़ाते लड़ाते उस दौर का इंसान मुस्कुराया करता था।कल एक बुलबुल मेरे कान में कह रही थी कि ए वलीअहद हमें पहचाना।
हम वही हैं जिनके लड़ने पर आपके पुरखे बल्लियों उछल कर हंसते थे और आप आज यू मायूस हैं।हमे लड़ाते लड़ाते आप खुद लड़ने लग गए हुज़ूर।आपको पता है अब हम सब हंसते हैं जब आप सबको लङता हुआ देखते हैं ।घंटों हवा में कलाबाजियां करतें हैं आपको देख कर।कल वोह मुर्ग़े भी ठहाके मारकर हस रहे थे जब आप अपने भाइयों से बाल पकड़ पकड़ लड़ रहे थे।
वोह तीतर भी पत्तो पर चहक रहा था जब आप अपने पड़ोस की औरतों से लड़ते लड़ते गन्दी गन्दी गालिया बक रहे थे।हुज़ूर उस क़ोयल ने तो कबका कान में रुई लगा ली जबसे आपके बच्चे माँ बहन के शैतानी अल्फ़ाज़ ज़बान पर लाने लगे।वह बुलबुल नाजाने क्या क्या बोले जा रही थी,लग रहा था कोई खड़ा करके मुझपर सैकड़ों घड़े पानी उँड़ेल रहा हो और मैं शर्म में शुतुरमुर्ग की तरह सिर्फ गर्दन झुकाए अपनी उतरती इज़्ज़त को देख रहा होऊं।उस पानी के बावजूद कोई भी हस्सास लखनवी मेरी आंखों के कोने से हल्के हल्के कुछ नमकीन होकर बहते पानी में तड़पती गोमती को देख सकता है।

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