आप पर लिखूं,यह कैसे हो सकता है।आपके क़दमों में लिखूं यह भी तो आपको नही पसंद था।जब सुकरात ,अरस्तू, इब्ने फिन,स्पेंसर,चाणक्य,कालीदास सबको मै जवानी के नशे में खारिज कर रहा था तब वह सिर्फ आप थे जिसे मै खारिज नही कर पाया।आपको पढ़ा,सुना फिर जब आपसे घंटों अकेले में बातें की तब ऊपर लिखे नामों को समझा।उनकी अहमियत समझी।
वह आप ही तो थे जिसनें आखों को ऐसे खोला की दीवार के पार दिखने लगा।दिमाग को ऐसे परत दर परत खोला की किसी तरह का मैल नही रह गया।रूह को तराशा।जिस्म में मोहब्बत की खुशबू डाली।अपनी माटी की अहमियत दिमाग में पैबस्त की। ज़िन्दगी को हर घड़ी जिसनें मज़बूत किया वह ही तो थे आप,वही तो थे मेरे विवेकानन्द।
आपनें हमे क्या पढ़ाया और लोगों नें आपको कैसे पढ़ा इसमें बड़ा फ़र्क है।आपने हमे मोहब्बत के साथ मिलकर रहने को सिखाया और दूसरे आपके ही नाम पर नफ़रत बांट रहे।आपने मानवता का बीज डाला लोग आपके नामपर इस ज़मीन को ऊसर बनाने निकल गए।मैं तो दावे से कहता हूँ मेरे विवेकानन्द नें जो वैचारिक,आध्यात्मिक और सामाजिक रेखा खींची है उसे इस काल में तो कोई छूने वाला नहीं,पार करना तो बस से ही बाहर है।
हां बीती रात उन्होंने हमसे कहा दोस्त घबराना नहीं जितना दिल करे मेहनत करो,मुझे एक सुकून पसंद और तरक्की पसंद हिंदुस्तान चाहिए ,मै हर वक्त तुम्हारे पीछे साए की तरह हूँ।मुझसे कहा की आज लोग मेरा जन्मदिन पूरी शान शौकत और जोश से मनाएँगे मगर यक़ीन करो अगर उनके दिल जोड़ने वाले नही हैं,तो मैं वहाँ पाँव भी नही धरूँगा।कल जब हम उनके पाँव दबाने लगे तो वोह बोले यह जो पाँव दबाते में तुम्हारे चेहरे पर सुकून है,यही सुकून पूरे भारत के चेहरे पर मुझे चाहिए।
जाओ कह दो विवेकानंद हर उस जगह से चले गए जहाँ लोग इंसानों के दिल बाँटे।उन्हें लड़ाएं।उनके घर उजड़ने पर खुश हों।मैं उन्हें सुनता रहा और गहरे सुकून की तरफ मन झुकता चला गया।अब मै भी बेफिक्र हूँ एक दिन ज़रूर हमारा मुल्क मुस्कुराएगा।विवेकानंद के साथ हुई रोज़ की बातें लिखने को बहुत है।जी चाहता है उनके मन की टीस को लिख दूँ जो उन्होंने आखरी वक़्त सही मगर कम्बख़्त आंखें भीग कर लिखना दुश्वार कर दे रहीं हैं और मेरे विवेकानन्द को आंसू पसंद नहीं।
आज जब विवेकनन्द के जन्मदिवस पर नौजवान झूम उठेंगे तब यह ख्याल रखना की विवेकानंद ने क्या कहा था और क्या किया था।परमहँस के इस शिष्य को महसूस कर सकना तब आगे बढ़ना।उसकी गहराई को नाप पाना तब कहना की हाँ मैं अपने देश का सच्चा सेवक हूँ।
विवेकानन्द आप हमारे दिल और ज़हन में हमेशा मज़बूती से रहेंगे कल रात वाला वादा फिरसे।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Wednesday, January 11, 2017
विवेकानंद
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hafeezkidwai
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