घर में प्रतिबन्धित कोई भी किताब को जब आप पढ़ते हैं।वोह एक अलग कहानी होती है।उसे अगर अल्फ़ाज़ों में सलीक़े या फूहड़पन से भी पिरोया जाए तो वोह एक खूबसूरत कहानी बन जाती है।
घर में प्रतिबंधित रिश्ते को अगर बनाया जाए तो वोह भी एक खूबसूरत कहानी होगा।उसे भी आने वाली नस्लें बड़े चाव से पढ़ेंगी।बस उन्हें लिखते वक़्त डर और संघर्ष को बराबर जगह दी जाए।
कुल मिलाकर मैं कहता हूँ की अगर तुम बनी हुई कोई भी लकीर पर पाँव रखकर निकल जा रहे हो,वोह कहानियों की बुनयाद है।जाते जाते अगर उसी लाइन पर शब्द बिखेरते जाओ तो बहुत सी कहानियां ज़िंदा हो जाए।यह कहानियाँ बहुत बार किसी को सहारा भी दे सकती हैं तो बहुत बार बड़ी मुश्किल से रोक सकती हैं।
मैं जब चलता हूँ तो मुझे इर्द गिर्द कहानिया दिखाई देती हैं।इन्हें चुनने का दिल करता है।चुन कर बुनने का मन करता है।बुन कर परोसने का दिल करता है।परोसने के बाद फिर निकल जाना चाहता हूँ ....जाते जाते जान लो प्रतिबन्ध से उपजी कहानी का कोई तोड़ नही....
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Sunday, January 8, 2017
कहानियाँ
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