Monday, January 2, 2017

3 जनवरी

वोह जब चलती थीं तो लोग उनपर गोबर फेंकते।कूड़ा फेंकते।पत्थर फेंकते।वोह बगल में एक अदद साड़ी दबाए आगे बढ़ जाती।उसकी उम्मीद और मेहनत इन पत्थरो के ज़ख्म,कूड़े और गोबर की गन्दगी से कहीं ज़्यादा बड़ी थी।उसने लड़कियों का पहला स्कूल खोला,खुद पहली महिला प्रिंसिपल हुई।उसने कलम उठाकर मराठा ज़मीन पर कविता उकेरी तो हिम्मत देकर लड़कियों को कलम पकड़ाई।यह वोह पहली औरत है जिसके सामने हाथ में पत्थर लिए मर्द औरते झुकती चली गईं।
आज जिनकी रखी नीव पर रौशनी डाल रहा हूँ वोह सावित्री बाई फूले हैं।उनका जन्मदिन है आज।जो लड़कियां आज़ादी की बात करती हैं, जो लड़के लड़कियों के खुले आसमान की वकालत करते हैं।वोह गहरी आँखों से सावित्री बाई फूले को देख ले,पढ़ ले और अपनी उम्मीद और ख्वाहिश को ज़मीन दें।लोग सावित्री बाई के पैरों में काँटे बो रहे थे,वोह उनकी नस्लों के पाँव के काँटे चुन रही थीं।कम से कम आज तुम सब उनपर फेंकी गई गन्दगी को महसूस तो करो,सावित्री बाई का अआँचल तुम्हे महका देगा।आज उनको रोज़ से ज़्यादा याद करो।
एक तरफ सावित्री बाई की पैदाइश का जश्न है तो दूसरी तरफ मेरे दोस्त मोहन राकेश का ग़म।कोर्स की किताबों में जिन मोहन राकेश को रट रट बड़ा हुआ।पता ही नही चला की कब वोह रूह में उतर गए।भारतेन्दु के बाद मोहन राकेश ही वोह थे जिन्होंने नाटकों को ऐसे थामा की हर नाटक,हर किरदार,हर मंच पर मोहन राकेश ही रह गए।दिल्ली की सर्द सुबह जब मोहन राकेश नही उठे तो लगा किसी नाटक का कोई नायक अचानक सो गया है मगर नही आजकी वोह सुबह नाट्य जगत की शाम थी।मेरे मोहन कभी नही उठे मगर वोह हर वक़्त मेरे इर्द गिर्द रहते हैं।जब मैं थियेटर में पाँव धरता हूँ तो चुपके से वोह कहते हैं, मैं भी तुम्हारे साथ नाटक देख रहा हूँ।मैं अपने कन्धों पर उनके रखे हाथ को जी लेता हूँ।
मेरे लिए सावित्री बाई की ख़ुशी है तो मोहन राकेश का गम भी है।एक की कलम कविता में डूब लड़कियों की सुबह बुन रही थी।तो दूसरे की कलम नाटकों में उलझ कर इतिहास बना रही थी।अपने देश की सौंधी खुशबू को महसूस करना हो तो इन सबको जान लो वरना एक दिन जानने को तरसोगे की मेरी माटी क्या है।इसकी महक कैसी है।इसका रँग क्या है।इससे फूटती रौशनी कैसी है।हाँ,यही मेरा भारत है।

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