Wednesday, January 18, 2017

मंटो के ख़त

कल मैं तुम्हारे ख़त पलट रहा था।एक वोह ख़त जिसमे तुमने उन दो रातों का ज़िक्र किया था,जिसमे तुम्हारे पास खाना ही नही था।तुम पेट को तकिया में लगाकर किसी तरह सोना चाह रहे थे मगर आतें भूख के लिए जग रही थीं।तुम हर भूख की बेताबी पर कलम से कुछ लिख देते थे,अगली सुबह लोग उन हर्फों में ज़ायका ढूंढते थे।रात उन अल्फ़ाज़ों में गूँथी भूख सुबह बहुतों के पेट भर रही थी।
कल मैं बहुत से ख़तो को लिए बैठा रहा।हर एक को लगा यह सनकी आज इन पीले कागजों में क्यों उलझा है।कोई कहता की कोई कहानी लिख रहा होगा।किसी ने पलट कर कहा की नही अख़बार के लिए आर्टिकल लिख रहा होगा।उनमे से किसी ने नही सोचा की मैं इन कागजों में किस्से मिल रहा हूँ।मेरी आँखे आखिर वोह क्या ढूंढ रही हैं जो इन कागज़ों में दफ़न हो गया है।
मंटो,हाँ मंटो कल सब तुम्हारे न रहने का दिन मना रहे थे।कह रहे थे की कल मंटो हमारे बीच से चला गया था।कितने झूठे लोग हैं न,कल ही तो हम तुमसे उन पन्नों में मिल रहे थे।कल उस ख़त को तुम्ही ने तो उठा कर दिया था,जिसको लिखते वक़्त तुम्हारी आँखों से निकला एक आँसू उस लफ़्ज़ को फैला गया था,जिसे मेरे लिए पढ़ना ज़रूरी थे।
मंटो हमे पता है तुम हर वक़्त हमारे साथ रहते हो,फिर भी इन ख़तो को कहो तो आग लगा दें।मंटो तुम्हारे यह ख़त न मुझे सोने देते हैं और न रोने देते हैं।हर ख़त मुझे अंदर तक गला देता है।लिखते तुम सियाही से थे मगर मुझमे यह तेज़ाब से उतरते हैं।मंटो मैं तुम्हारी पुण्यतिथि मना ही नही सकता,इसको मनाने के लिए तुम्हे मरना होगा।जो हमारे रहते तो नामुमकिन है।चलो हम चाय पीते हैं तुम्हारे लिए वोह सुनहरा गिलास इंतज़ार कर रहा है, डियर मंटो।

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