Thursday, January 12, 2017

कैफ़ी

कल क्या है? १४जनवरी और क्या।जी हां और क्या कुछ भी तो नही सिवाय इसके की रोज़ तारीख ही तो बदलती है।इन तारीखों में कोई गुज़रता है तो कोई पैदा होता है।न गुज़रने वाले को कोई याद रखता है और न पैदा होने वाले को।कुछ नाम अगर सूखे दिमाग में कहीं याद रह भी जाए तो क्या।हाँ बात यही तो क्या से शुरू होती है, तो वाक़ई हम अपनी नीव को नही भूले।हमे याद रखना चाहिए उन तारीखों को जो हमारी मुस्कुराहट की वजह बनी हैं।कल क्या है यह जानना ज़रूरी है।
कल एक इंसान पैदा हुआ था।आपकी नज़र में वह शायर होगा ,नेता होगा ,समाजसेवी होगा या फिर कामरेड होगा।मेरी नज़र में वह सिर्फ़ इंसान था,जो होना बेहद कठिन काम है या कहें साधना है।वोह अपनी बहनो के साथ रोता था,भाइयों के पीछे छुप जाता था,माँ के आँचल में दुबक जाता था,बाप की ऊँगली पकड़ काँटों को फाँद जाता था।उसमे मोहब्बत थी,दर्द था।वोह बहनो में खुलकर खेलता तो भाइयों को नगमे सुनाकर एक करता।वोह एक ऐसा इंसान था जो रोता भी था,हँसता भी था,फौलादी जज़्बे के साथ मोम जैसे दिल का था।औरत को कँधे से कन्धा मिलाकर चलने को उसने हो तो कहा था।जी वह इंसान थे कैफी आज़मी।
उनके हर दर्द पर आसूं थे।वह आसूं आगे चलकर गज़ल बनते और उनकी टीस बन जाती नज़्म।वोह मदरसे की दीवार फाँदकर नई रौशनी की खिड़की खोलता तो कभी कुरान दकियानूसी किताबो के वरख जलाकर तेज़ रौशनी की इबारत लिखता।जब हम सब ख्वाब देखते की मुम्बई जैसी चकाचौंध मिले तब उस ऊचाई को और सारी शान ओ शौकत को छोड़ कर वह गांव आ गए।उस गांव जिसे हम सब तरक्की के नाम पर कब का छोड़ चुके हैं ।अपनें मिजवां गांव की तरक्की के लिए इस इंसान नें ज़मीन और आसमान एक कर दिया।
कैफी तुम्हें लिखें तो कितना लिखें ,महसूस करें तो कितना महसूस करें ।बस दोस्त तुम मुझे इतना आईना दिखाओ की मुझे अपना चेहरा भी अच्छा लगने लगे तभी तो मै भी इंसान बन पाऊँ।मुझे भी इस ज़मीन में मोहब्बत की फसल बोनी है।कैफी वादा है तुम्हारे ख्वाबों का हिंदुस्तान हम ज़रूर बनाएंगे।तुम जहाँ कहीं भी हो वहाँ से मुस्कुराना और मै नीचे खुशी खुशी पसीना बहाकर मुस्कुराता हुआ हिंदुस्तान बनाऊंगा।वादा।

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