इनके दादा ने एक फतवा दिया,जी वही फतवा जिससे आज आप बिदक जाते हैं।जिसको सुनते ही आपके कान खड़े हो जाते हैं।वही मदरसों से निकला फतवा।वही मौलाना की ज़बान से निकला फतवा जो अब मिज़ाइल की तरह मीडिया पर गिरता है उसकी बात कर रहे हैं।हाँ इनके दादा ने उस वक़्त ब्रिटिश हुक़ूमत के खिलाफ फतवा दिया और कहा हर एक को मुल्क़ भारत को आज़ाद कराने के लिए उठ खड़े हो जाना होगा।वोह मुफ़्ती अब्दुल करीम को अंडमान की जेल में डाल दिया गया।
अब मुफ़्ती करीम के बेटे की बारी थी मौलाना माजिद दरियाबादी की।जिन्होंने ताउम्र क़ाबलियत की मिसाल बिखेरी।उनके हाथ से निकली किताबे दुनिया भर की यूनिवर्सिटी में टहलने निकल गई।उन्होंने अँगरेज़ हुक़ूमत को ही हराम कर दिया।ताउम्र इनसे लड़ते रहे और नई नई खुबियों को गढ़ते रहे।यह आज इसलिए बता रहे हैं क्योंकी आपको मालूम होना चाहिए की किस इंसान,किस कुनबे ने अपने ख़ून से आपके लिए आज़ादी की थाल सजाई थी।
अब माजिद दरियाबादी के भतीजे और दामाद से मिलिये जनाब हाशिम क़िदवई से,जो कल शाम बड़ी ही ख़ामोशी से चले गए।अथाह क़ाबलियत और मुल्क़ से मोहब्बत।बाप दादाओं से ज़मीन का कर्ज़ा और इल्म को फैलाने की ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई।कल वोह हम सबको छोड़कर अपने बाप दादाओं से जा मिले।
मैं कहता हूँ इतने अंजान मत बनो।जानो किसने वाक़ई अपने कन्धों पर मुल्क़ की आज़ादी और तामीर की ईंटे ढोई हैं।उन्हें ढूंढो,पढ़ो और इनके पसीने को महसूस करो।कल जब मैं हाशिम साहब के न रहने को सुन रहा था तो लगा कोई नीव की ईंट खिसक गई।ऊपर बिखरे हर नाम को ढूंढो तब देखना यह ज़मीन इतनी खूबसूरत क्यों है वजह मिल जाएगी।हाशिम साहब आज अलीगढ़ में तो ज़मीन में सो जाएँगे मगर हमारे ज़हन में ताउम्र ज़िंदा रहेंगे।
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