Friday, January 27, 2017

दिमाग में राख

किताबो को आग लगा दो क्योंकि तुम्हारे दिमागों में राख भरी हुई हूँ।तुम्हे अफ़साने और हक़ीक़त का फ़र्क जब नही दिखता तो वाक़ई ख़ुदा पर शक हो जाता है।आखिर ख़ुदा ने किस ठेके पर तुम्हे बनवाया की इतनी गड़बड़ रह गई।तुम्हारे दिमागों की जगह ठेकेदार ने राख भरकर ईश्वर को धोखा दिया है।
।जूझे तो हैरत हुई की अभी तक कोई मुस्लिम समाज से खड़ा क्यों नही हुआ की सवर्ण अकबर और सलीम ने पसमांदा अनारकली के साथ अन्याय किया।किसी संगठन ने मुगले आज़म फ़िल्म की कैसेट और पोस्टर क्यों नही जलाए की इसमें पसमांदा समाज की अनारकली के साथ सलीम के सम्बंध गलत तरीके से दिखाए गए।
मूढ़ों तुम्हे क्या पता अब्दुल हलीम शरर ने अनारकली का किरदार गढ़ कर एक अफ़साना लिखा और तुम उसे अकबर के खानदान में सच की नज़र से देखने लगे।कभी किताब को पढ़ने की हैसियत से खोला होता तो पता चलता की एक लेखक जब अपने किरदार गढ़ता है तो उसमे कितनी खूबसूरती से कल्पना को सच का लिबास पहनाकर सामने रखता है जिसमे कमअक्ल लोग सच के धोके में लिपट जाते हैं।
इक दौर में मौलाना दाऊद ने चंदायन को लिख एक रौशनी दी क्या यह किसी ख्वाब से कम है।चंदायन के लफ़्ज़ की खाल अब उधेड़ो।प्रेमवन जीव निरंजन को जब शेख रिज़्कुल्लाह मुस्तकी ने लिखा तब क्या दौर रहा होगा।कोई ने उनसे खींचकर सवाल क्यों नही किये।बनने के उस दौर में सपनावती, मुग्धावती, मृगावती,मधुमालती,प्रेमवती जैसी मोहब्बत की दास्तान उकेरी गई।उस्मान,शेख नबी,कासिम शाह,नूर मुहम्मद,जान कवि,शेख निसार,शाह नजफ़ अली,ख्वाजा अहमद,शेख रहीम,कवि नासिर,अमीर खुसरु,मालिक मोहम्मद जायसी यह वह नाम हैं जिन्होंने हिन्दुस्तान की रूह को छुआ।जायसी ने तो पदमावत, अखरावट,आखिरी कलाम, महरी बाईसी यानि कहर नामा,चित्रलेखा,मस्लानामा,कन्हावत जैसी रचना करके एक शिखर बना डाला।
वही पद्मावत जिसे कल से इश्क़ ए हक़ीक़ी समझ बौराए घूम रहे हो।जाओ और जायसी को कब्र से निकालकर आग लगा दो।हम तो कहते हैं ऊपर लिखे हर नाम को ढूंढो और चौराहों पर आग लगा दो।हर उसको खत्म कर दो जिसने अपने अफसानों,कविताओं में किसी दूसरे धर्म,जाति समुदाय के नाम डाले हैं।अब्दुल हलीम शरर को अनारकली के साथ अन्याय करने के लिए पसमांदा समाज जाए और उनकी रूह के टुकड़े टुकड़े कर दे।एक काम और कर दो सब लेखकों से कह दो नाम की जगह अ ब स द इस्तेमाल किया करें न जाने कब किसकी भावनाएँ आहत हो जाए।भावनाए न होगी फूफा जी हो गई।
एक और सच जान लो तुम उठो और कव्वे गिलहरी और टपका का डर टाइप कहानियां ही पढ़ो।बहुत से बहुत सरस सलिल में राल टपकाओ।जायसी,शरर,कबीर,खुसरु समझ तो आएँगे नही तब भावनाएँ ही आहत होंगी।

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