ठोकरों के अब्बा को खाने के बाद भी फिर बहुत तेज़ से प्यार लगा था।यह बारहवें इश्क़ का हैज़ा था।जब तुम आई तब यह कहना मुश्किल है की हमने तुम्हारी तरफ पलट कर नही देखा था।बड़ी आम सी आँखों में तुमने ग्राफ स्टाइल का काजल लगाया हुआ था।इस काजल से आँखे ज़रूरत से ज़्यादा बड़ी लग रही थीं तो एक बार देखना तो बनता था।मगर आज सच बताऊँ मैंने जब तुम्हे देखा था तो बिलकुल अंदाज़ा नहीं था की कोई बड़ी मुसीबत नाज़िल होने वाली है।
तुम इस क़दर पढ़ाकू थी यह तो बात में अंदाज़ा हुआ।मैं चुपके से तुम्हारी सीट पर सरक आया था की चलो फिज़िक्स की डेरीवेशन से अच्छा तुम्हारी आँखों में डूब जाऊँ।मगर तुम कितनी बेहिस थीं।तुम ब्लैकबोर्ड देखती रहीं और मैं तुम्हारी आँखों में घिसती हुई चॉक देखता रहा।यही मौसम था,याद हैं न जब तुम कॉलेज के गेट से ही चीख़ती आ रही थीं।
मुझे लगा आज तो तुम कुछ कह ही दोगी मगर नही आते ही तुमने न्यूटन का थर्ड ला पूछ लिया।कमबख्त न्यूटन,आइंस्टीन ने गुलाबी मौसम की बैंड बजा रखी थी।तुमने भी कोई कसर नही छोड़ी की किसी बहाने हम पढ़ लें मगर अपने आप से किये वादे पर मैं बिल्कुल नही पलटा, वही वादा की पढ़ेंगे-घण्टा।
लेकिन तुम भी यार इतना पढ़ीस कैसे थीं।जब मैंने कहा था की तुम्हारी माँ की डिलिवरी क्या कैमेस्ट्री की लैब में हुई थी क्या तब तुमने कहा था नही फिज़िक्स की लैब में।तुम्हारी माँ की प्रोफ़ेसरी हमारी मोहब्बत में बार बार आड़े आ रही थी तुम्हे हीलियम,एल्युमिनियम याद करना था और हमे तुममे शरबती आँखे ढूंढनी थीं।
किस क़दर फासले का प्यार था।यह सच था की यह मोहब्बत दूर तक जाती अगर तुम इम्तिहान में हमसे दूर न बैठती।जब पहली बार मुझे तुमसे ज़्यादा तुम्हारी पढ़ाई की ज़रूरत थीं तब कमबख्त तुम इतने छोटे दिल की निकलीं की एक भी आंसर नही बताया।हद तो तब हो गई जब ई इज़िकलटू एम सी स्क्वायर का स्क्वायर तक नही बताया और हम इ की एम सी करके आ गए।
रिज़ल्ट के बाद जब तुम सफेद कपड़ों में ज़बरदस्त परफ्यूम लगाकर,किताबों को कहीं पीछे छोड़कर,आँखों को ठंडे पानी से धोकर,होंटो पर फूल सी मुस्कान रखकर आई और आते ही कहा,डियर कैसे हो और मैंने कहा चलो निकल लो आइंस्टीन के पास,यहाँ पोलर बियर की ज़रूरत नही।तुमसे बेहतर हिलरी हैरिसन की केमिस्ट्री की बुक है।निकल लो।दफ़ा हो जाओ अब मुझे पढ़ना है।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Monday, January 23, 2017
आशिक़ी बारहवीं
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hafeezkidwai
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