वोह उनकी औरतों के चाबुक मारते,इतना मारते की औरतों की खाल उतर जाती।उन औरतों के आदमी कहते की यह लोग ठीक कर रहे हैं।यहाँ तक बची हुई औरतें कहती की हाँ हमे ऐसी ही सज़ा मिलनी चाहिए।उनके इलाकों में अस्पताल पर ताले पड़ गए,स्कूलों को अंग्रेजी एजुकेशन के नाम पर गिरा दिया गया।ज़बरदस्ती पढ़ने या इलाज कराने वाले के सर पर गोली मारी जाने लगी।हैरत यह थी की हर ज़ुल्म को ज़ुल्म सहने वाले ही सही ठहरा रहे थे।जानते हैं क्यों,क्योंकि उन्हें उनके धर्म और संस्कृति की रक्षा करनी थी।
यह हालात अफगानिस्तान में तालिबान ने बनाए थे।अब ज़रा अपनी चौखट पर आ जाइये।देखिये आप भी अब बहुत सी परेशानियां सहने लग गए हैं।अब आप भी धर्म और संस्कृति के नाम पर हर ज़ुल्म को अपने चबूतरे पर पानी पिला रहे हैं।एक दिन आएगा जब आपके भी अस्पताल और स्कूल पर ताले लगेंगे।हैरत से मत देखिये,अफगानिस्तान में भी यह नामुमकिन लगता था,मगर हुआ।हमारे यहाँ भी किसने सोचा था की हमें धर्म और संस्कृति की घुट्टी पिलाकर कमज़ोर किया जाएगा,आखिर हो रहा है की नही।
एक नज़र उन इलाकों पर डाल लीजिये,जहाँ लोकतन्त्र का महोत्सव होने जा रहा है।देखिएगा यहाँ आपकी बोटी बोटी की क़ीमत कैसे लगेगी।इसी महोत्सव में आपकी संवेदना,दर्द,चोट,कमज़ोरी उभारी जाएगी,उसे बेचा जाएगा।यही वक़्त आपका धर्म,क़ौम मण्डी में बिकेगा।आपके दर्द का सौदा होगा।महोत्सव की छत पर आपका भविष्य कौड़ियों में बिकेगा और अआप मदमस्त चकल्लस में अपनी खाल से जूतियों को बनते देख खुश होंगे।
यही तो तालिबानी सोच की आहट है।जब आपको अपने दर्द से ज़्यादा धर्म का दर्द होने लगे।जब आपको अपने बच्चों के फ्यूचर से ज़्यादा क़ौम का फ्यूचर दिखने लगे।जब आप जैसा निकम्मा,कमज़ोर,अदना सा इंसान ईश्वर की रक्षा का भरम पाल ले।तो आपको बेचने वालों के दरवाज़े तो खुल ही जाएँगे।तुम आज अपने जिस्म को धर्म और संस्कृति के झूठे रक्षको को दो,कल सौ फीसदी इनके कोड़ों,लाठियों की ज़द में तुम्हारी औरतों,बेटियों की पीठ होगी।मुझपर यक़ीन न हो तो मुड़कर पुराने रक्षको को देख लो।अड़ोस पड़ोस में देख लो।
इस गलतफहमी में मत रहना की यहाँ ऐसा कुछ नही हो सकता।लिख लो ऐसा हर उस जगह हो सकता है जहाँ एक धर्म किसी दूसरे धर्म की हत्या को सवाब समझता हो।जहाँ धर्म और संस्कृति की कमज़ोरी की वजह दूसरों पर डाली जाती हो।जहाँ बादशाह की सिर्फ एक ही काबलियत हो की वोह धर्म और संस्कृति का बड़ा ठेकेदार है।ऐसी हर जगह,तालिबानी सोच के दरवाज़े खोलती है।
हमसे जी भर असहमत हो लें,गाली भी दे लें,नफरत भी कर ले,नकार भी दें फिर भी अगर ऊपर लिखी एक भी आहट दिखाई दे।तो उसका विरोध ज़रूर कीजियेगा।जब भी लगे की अब ज़ंज़ीर आपके पाँव के नज़दीक़ है तो एक झटके मे पाँव खीच लीजियेगा।हमारा क्या है,आज नही तो कल आपकी क़ौम,धर्म,संस्कृति की रक्षा के नाम पर खत्म कर ही दिए जाएँगे।हमारे ख़ून से क़ौम और धर्म के दिए कुछ ज़्यादा ही रौशनी करते हैं।
No comments:
Post a Comment