Monday, January 16, 2017

अमर चरित्र

जब आप बड़ी तेज़ी से बढ़ रहे होते हैं।एक साथ कई मोर्चो पर लड़ते हैं।चुन चुन कर संगठन या परिवार को खूबसूरती से गढ़ रहे होते हैं।धीरे धीरे भीड़ आपकी तरफ हसरत भरी नज़र से देखने लगते हैं।आपकी हर हरकत पर लोगों को लगता है वाक़ई यह क़दम ही तो अब तक नही उठाया गया था।वोह आपके कँधे पर हाथ रखकर आपको सराहती है।

इसी बीच जब आप ज़बरदस्त हौसले से लबरेज़ आगे बढ़ रहे होते हैं।तब आपके ही बीच से कोई आपको आगे बढ़ने के लिए पैसो की कमी को दिखाता है।वोह बताता है काश अगर हमारे पास पैसा होता तो आज हम इन बड़े संगठनो,परिवारों,गुटों को कब का पिछाड़ देते।आपको भी लगता की बात तो सही है बिना धन के कैसे संगठन खड़ा हो।आप अपने कल के तिनका तिनका जोड़कर खड़े कुनबे को भूल धन पर टिकते चले जाते हैं।

बस यहीं से शुरू होता है "अमर चरित्र"।वोह आपकी पैसों की वजह से रुकी छोटी छोटी ज़रूरतों पर हाथ रखता है।आपके खाने से आपके जाने तक की फ़िक्र करता है।इतने दिनों की मेहनत से आई तलवों की सख्ती पर हाथ रखकर उन्हें नरम करता है।इसी बीच यह अमर चरित्र आपको वोह दिखाता है जो संघर्ष के दिनों में आपसे देखने को रह गया।

अमर चरित्र आपसे गलती करवाता है,फिर आपको तसल्ली देता है की मेरे रहते आपका कोई कुछ नही कर सकता।वोह आपके गुनाहों पर पर्दा डालता है।आपको हिम्मत भी देता है।बहुत बार आपके संघर्ष को इतना आसमान पर चढ़ा देता है की संघर्ष के साथी धुंधले दिखने लग जाते हैं।

अमर चरित्र की सबसे खास आदत होती है की यह आपके अगल बगल करीब के लोगों के प्रति शक डालता है।जब तक आपके पास बैठे लोग आपसे दूर न जाने लग जाए,तब तक अमर चरित्र कारगर नही हो सकता।इसलिए वोह आपके करीब के लोगों को छांटना शुरू करता है।वोह आपकी संवाद की क्षमता को भी कमज़ोर करता है।आप जितना केंद्रित होते जाएँगे अमर चरित्र उतना मज़बूत वट वृक्ष बनता जाएगा।

यह बाते किसी एक के लिए नही हैं।मैंने बहुत से व्यक्तियों,संगठनो,राजनीतिक दलों को खण्डहर होते देखा है।इनके खण्डहर होने में अमर चरित्र का अमर योगदान हैं।अगर आप कुछ करना चाहते हैं तो आँख और दिमाग खुला रखिये।हर उस इंसान को जो आपकी कमज़ोरी पर पर्दा है, नज़र रखिये।देखिये कहीं कोई आपको आपके अपनों से धीरे धीरे दूर तो नही कर रहा।आपके अपने एकदम से कहीं दूर तो नही हो रहे।कहीं सच आपके सामने छन छन के तो नही लाया जा रहा है।रुकिए और देखिये,तब चलिए।

अमर चरित्र हर दौर में,हर जगह रहे हैं।बस एक मज़बूत इंसान ही इनसे बच सकता है।यह वोह बीज है जो दीवार की दो ईंटो के बीच कहीं से आ जाता है।फिर इन ईंटों के मन मुटाव से ताक़त लेता हुआ बढ़ता जाता है।वक़्त रहते इसका भोजन नही रोका गया तो यह पूरी दीवार, फिर घर को अपने कब्ज़े में लेकर खण्डहर वीरान बना देता है।अपने संगठन में उनपर नज़र रक्खें जिनके आने से आपकी परछाई किनारा करने लगी हो।यह बहुत मुश्किल नही है।न हो तो एक बार गाँधी को देखना,उन्होंने अमर चरित्र से बकरी तक चरवाई हैं मगर खुद नही चरे।

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