मैं चुपके चुपके जा रहा था।किसी के पाँव की आवाज़ें कान में पहुँच रही थी।लग रहा था कई साए पीछे पीछे मुझे भी साया बना लेने के लिए बढ़ रहे हैं।एकदम से बड़े से नीम के पेड़ के पास मैं ठहर गया।वोह सभी साए मेरे नज़दीक आ गए।मैं डर जाता अगर उन्हें वक़्त रहते पहचान न लेता।मैं बिखर जाता अगर उन्हें समझ न लेता।
वोह राम थे।उनके साथ ईसा थे।ईसा के पीछे कृष्ण थे।कृष्ण के बगल में मोहम्मद थे,मोहम्मद के कँधे पर मूसा हाथ रखे हुए थे।मूसा की आड़ में बुद्ध थे।बुद्ध का हाथ पकड़े गुरु नानक थे।इन सबको देख अगर मैं डर जाता तो इंसान ही न रहता।हैरत से हमने इन्हें देखा तो सब एक आवाज़ में मुस्कुराते हुए बोले।तुम्हे क्या लगता है, हम सब यहाँ क्यों आए हैं।
वोह आगे बोले तुम क्यों नही उठते उन चादरों को खींचने जो हमारे नाम पर बेजा इस्तमाल हो रही हैं।तुम किस हद दर्जे निकम्मे हो की हमारे नामपर बहते ख़ून को भी रोकते नही।क्यों नही कह देते इन सबसे की यह चाहे जितने मेरे नाम ज़बानों पर लेलें,इनके जिस्म से उठ रही नफ़रत की बदबू मेरे नज़दीक़ इन्हें आने ही नही देगी।हम ज़मीन के हर हिस्से में एक हैं,तुम इनको क्यों नही समझाते की हर दिशाओं में हम ही हैं।
हमारे नाम पर जिस ज़मीन के टुकड़ों को लेकर यह लड़ रहे हैं,कल उसका भी नक्शा बदल जाएगा।कल न यह रहेंगे और न इनके घिरौंदे,जैसे पहले वाले भी चले गए।हाँ ज़मीन से आसमान तक सिर्फ दो बातें रह जाएँगी।एक नफ़रत एक मोहब्बत।
इनसे कह दो न यह अपने बच्चों को जो देना चाहते हैं वोह अपनी ज़िन्दगी में बो दें।नफ़रत बो दें तो हम सौ गुना नफ़रत इनके बच्चों की झोली में डाल देंगे।मोहब्बत बो दें तो हम सौ गुना मोहब्बत इनके बच्चों की झोली में डाल देंगे।
मैं कहता की अर्रे वोह सारे सब समझदार हैं, एक न सुनेंगे उससे पहले तेज़ आँधी इन सबको धुन्धला करती हुई चली जाती है।मैं पेड़ की टेक लगाए,भर्राए गले,आँसुओं से भरी आँखों से इन सभी सायों को नासमझ कहकर नीम की सींक चुनने लगता हूँ।नीम की तीली चुनना मेरा बेहतरीन शगल है।मैं अब इन सायों के कहे लफ़्ज़ भी बाहर नही कहता,क्योंकि बाहर सब बहरे हैं।
मुझे पता है तुम सब फिर आओगे।तुम्हे आना ही होगा।ताकि आज नही तो कल मैं तुम्हारी बातों को नीम की सींक से ज़्यादा तरजीह दे पाऊँ।हो सकता है नीम की पत्ती की कड़वाहट ही मेरे जिस्म में पल रही नफ़रत को मार सके।तब यक़ीनन मैं मुस्कुराकर आप सबके गले लग जाऊँगा।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Sunday, January 1, 2017
वोह आए थे
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hafeezkidwai
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