उसका परिवार शाही घोड़ों की ज़ीन और काठी बनाता।बहुत मेहनत के बाद घर में दो वक़्त की रोटी आ पाती।जैसे जैसे वोह बड़ा होने लगा उसकी ख़ुराक बढ़ने लगी।अब बढ़ी हुई भूख को मिटाने के लिए उसे भी काम करना होगा।5 साल का यह बच्चा भी बाप के साथ ज़ीन और काठी बनाने में जुट गया।
बच्चा तो बच्चा,इस काम में भी अपने खेल का इंतज़ाम कर लिया।लकड़ी,चमड़े,लोहे,कैंची,चाकू से वोह दिल बहलाने लगा।साल दर साल गुज़र गए।एक दिन खेल खेल में 8 साल के बच्चे ने चाकू उछाला की वोह उसके खेल से इतर उसकी आँख में लग गया।ख़ून की एक धार ने उसका पूरा चेहरा भिगो दिया।उसकी एक आँख चली गई।देखते देखते ज़ख्म की ज़द में दूसरी आँख भी चली गई और ज़ीन काठी बनाने वाला 8 साल का बच्चा अपनी आँखों की रौशनी गवा बैठा।
असली सफर तो तक़लीफ़ की बुलन्दी पर शुरू होता है।एक चर्च के पादरी ने बच्चे की ललक और ग़रीबी पर तरस खाकर उसे रॉयल इंस्टिट्यूट फॉर ब्लाइंड में भिजवा दिया।यहाँ उसने पढ़ना सीखा।शाही सेना की कूट लिपि ने उसे पढ़ना तो सिखा दिया मगर उसके मन में एक टीस थी।
उसने अपने शब्द खुद गढ़ने शुरू किये और बचपन में घोड़े की काठी में लगी कीलों को महसूस करके 6 बिन्दुओ की एक स्क्रिप्ट सामने रख दी।बिना आँख के इसे पढ़ना बड़ा आसान था।मगर उसकी ज़िन्दगी इतनी कहाँ आसान थी।उस पादरी के सिवा किसी ने उसे तवज्जो नही दी।वोह अपने गढ़े शब्द लिए खड़ा रहा।संघर्ष करता रहा।आखिरकार 43 साल की मामूली उम्र में दम तोड़ गया।उसके मरने के बाद फ़्रांस सरकार को लगा की यह स्क्रिप्ट तो बड़े काम की है।तब दुनिया ने देखा पहली बार ब्लाइंड्स के लिए विश्व प्रसिद्ध ब्रेल लिपि।
यह लुई ब्रेल थे।जिनकी मैं बात कर रहा था।आज इनका जन्मदिन है।ऐसे लोगो को पढ़िए जिन्होंने दूसरों की जिंदगियां आसान की हैं।जिन्होंने काँटे नही बोए बल्कि फूल डाले हैं राहों में।ज़िन्दगी को दोस्त ऐसे ही बनाओ की वोह ज़ंज़ीर खोले नाकी ज़ंज़ीर डाले।मोहब्बत से इंसानियत से दिल बड़ा कर लो तो तुम्हारा दिल खुद लुई ब्रेल की तरह रास्ते बनाते जाएगा।
अपने बच्चों को निर्माण के रास्ते सिखाओ।विनाश सिखाओगे तो विनाश ही करेगा।मोहब्बत सिखाओ,वरना नफ़रत तो इफरात मिल ही रही है।आज लुई को पढ़ें ताकि आपके दिल में एक कोपल फूटे,पता नही कब यह कोपल बरगद का वृक्ष बन जाए।आज बड़े याद आए मेरे दोस्त लुई ब्रेल।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Tuesday, January 3, 2017
लुई ब्रेल
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hafeezkidwai,
Louis braille
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