Wednesday, September 21, 2016

दिल को रौंदती मोहब्बत

यह मोहब्बत के किस्से हमारे दिलों को रौंद देते हैं...
"हमेशा की तरह दोपहर को बादशाह नसीरुद्दीन अपने बेगम मलिका ए ज़मानी के महल में दाखिल हुए।बेगम ने ख़ूब प्यार उंडेलते हुए कहा,नवाब साहब कहिये आपकी क्या ख़िदमत की जाए।नवाब नसीरुद्दीन ने प्यास का इशारा किया।एक इशारे पर एक बाँदी थाल में गिलास लेकर हाज़िर हुई।नवाब ने बड़ी गौर से उस बाँदी को देखा और कहा"आज से पहले तो तुम्हे नही देखा,नई हो क्या"जवाब में बाँदी ने हाँ में सर हिला दिया।नवाब साहब को तफ़रीह सूझी और गिलास का बचा पानी बाँदी पर छिड़क दिया।बदले में बाँदी ने थाल में गिरा पानी नवाब साहब पर उलट दिया।नवाब गुस्से में लाल पीले हो गए और बोले एक बाँदी की यह हिम्मत की नवाब से गुस्ताखी।तभी बाँदी बोली"जब दो हम उम्र लोग तफ़रीह करते हैं तो लिहाज़ नही किया जाता और ना ही बुरा माना जाता है।"नवाब को जवाब भा जाता है।खैर बाँदी को उसकी गुस्ताखी की सज़ा मलिका ए ज़मानी देती हैं और उसे महल से निकाल दिया जाता है।अब जब भी नवाब आते तो बाँदी का ज़िक्र छेड़ देते,यह बात मलिका को नागवार गुज़रती।आखिरकार अपने वज़ीर की मदद से नवाब साहब बाँदी को बुलवा लेते हैं।निकाह करके अपनी बेगम बना लेते हैं बाँदी को नाम दिया जाता है कुदसिया बेगम।कुदसिया बेगम बड़े नेक दिल की थी जल्द ही नवाब साहब के दिल ओ ज़हन पर कब्ज़ा कर गई।गोमती किनारे खड़े बेगम कुदसिया चाँद निहार रही थीं।पूर्णिमा का चाँद पानी से टकराकर बेगम कुदसिया पर बिखर रहा था।इस ज़बरदस्त खूबसूरती पर न्योछावर होकर नवाब उस रात ही कुदसिया बेगम को मलिका ए ज़मानी बना देते हैं और उन्हें ख़िताब देते हैं मलिका आफाक कुदसिया सुल्तान मरियम बानो बेगम साहिबा मलिका ए ज़मानी।नई बेगम का जलवा अवध में बोलने लगा मगर यह ज़्यादा दिन नही चला।नवाब साहब ने बेगम कुदसिया महल के लिए कोठी दर्शन विलास बनाई।उसी में कुदसिया महल को नवाब साहब की नाराज़गी का पता चला।किसी ने नवाब साहब के कान भर दिए थे की कुदसिया बेगम किसी और मर्द को चाहती हैं।नवाब साहब गुस्से में उनसे दूर चले गए।कुदसिया बेगम ने मन मसोसकर ज़हर खा लिया।जब नवाब साहब को पता चला तो वह नंगे पैर भागे हुए अपनी महबूब बेगम के पास आए और उनका सर अपने पैरो पर रख रोने लगे।तभी भीगी आँखों और लरज़ती ज़बान से कुदसिया महल ने नवाब नसीरुद्दीन से कहा"मेरे हमसफ़र,मेरे मालिक,मेरी आपसे पहली शर्त थी की आप मुझे शक की नज़र से नही देखेंगे।जिसे हज़रत ने तोड़ दिया।मैंने निकाह की रात अर्ज़ किया था की आपकी नज़र बदलते ही मेरी हस्ती मिट जाएगी।जब मालूम हुआ हुज़ूर की नज़र फिर गई तो मैंने अपना क़ौल निभाया।आपकी कुदसिया सिर्फ आपकी थी।यह कोठी दर्शन विलास हमारी पाकीज़गी की गवाह रहेगी।इसके हर दर ओ दीवार हमारी मोहब्बत के गवाह होंगे।"कहते कहते कुदसिया महल खत्म हो गई...©

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