Thursday, September 29, 2016

हड्डी

यह जो जिस्म है,ज़रा ग़ौर से देखिये इसे।इसमें अलग अलग खाल है।खाल के नीचे गोश्त है।गोश्त में नसें हैं।नसों में ख़ून है।ख़ून में अब हम नही घुसते,वरना पूरी विज्ञान लिख जाएगी।इस ख़ून,नस और गोश्त के ख़मीर के नीचे हड्डी हैं।जब मेरी नज़र हड्डी को देखती हैं तो रुक जाती हैं।सोचता हूँ की क्या इन हड्डियों की ज़रूरत थी।बिना हड्डी के बदन को देखते हैं तो सिर्फ गोश्त की गठरी दिखती है।यानि पूरा जिस्म बिना हड्डी के खड़ा भी नही हो सकता।जब मैं और गौर से देखता हूँ तो हड्डियाँ मुझे अनुशासन की निशानी लगती हैं।हाँ यह हड्डियाँ हमारे जिस्म पर अनुशासन हैं।गोश्त कहीं से भी मुड़ सकता है मगर हड्डी नही।हड्डी उतना ही मुड़ेगी जितना जिस्म के लिए ज़रूरी है।उससे ज़्यादा मोड़ने पर टूट जाएगी।चटख जाएगी।मैं जब इंसान की रीढ़ को देखता हूँ तो लगता है की टुकड़ो टुकड़ों में भी हम काफ़ी झुक सकते हैं मगर सीधी दिशा में,दिशा के उलटे होते ही वोह टूटने लगती है।मुझे लगता है की थोड़ा अनुशासन हड्डी की तरह ही है जो ज़रूरी है।जो हमे खड़ा रखता है।जो हमे समेट लेता है।जो हमे एक सुन्दर आकृति देता है।इसलिए जिस्म की तरह ज़िन्दगी में भी अनुशासन ज़रूरी है।थोड़ा अनुशासन ज़रूर रखिये।अपने पर और अपनों पर।जिस्म की तरह मुल्क़ को भी उस हड्डी की ज़रूरत है।यह अनुशासन हमे हमारे रहन सहन में दिखना चाहिए।जैसे बदन आपका है और हड्डी आपकी,वैसे ही मुल्क़ आपका है और अनुशासन भी आपका।जैसे चाहिए मुल्क़ की तामीर कीजिये।समाज बनाइये।सब आप पर ही है।अपने रास्ते और रास्ते के नियम और अनुशासन को तय करके आगे बढ़िए।बस आगे बढ़ जाइये।खूब आगे।©

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