आपको हमेशा ऐसा क्यों लगता है की आपका तजुर्बा ही सही है।आपके सफ़ेद होते बाल हमेशा ही सही हों, यह तो मुमकिन नहीं।जैसे ही हम पिज़्ज़ा हाथ में लेंगे आप सत्तू की तारीफ़ के पुलिंदे बाँधने लगेंगे।हमे काली शर्ट पसन्द है तो आपको उसपर एतराज़।हमे कसे कपड़े पसन्द है तो आप ढीले कपड़ों की खूबियाँ बताएंगे।इत्तेफ़ाक़ से डर डर कर अगर बाहर खाना खाने को कह दिया तो आसमान सर पर उठा लेंगे।ख़ुद सारा दिन टीवी पर न्यूज़ देखेंगे मगर हमारी पसन्द की एक भी हॉलीवुड मूवी आपके गले नही उतरती।भय्या यह जो ढेर भर त्यौहार आपने पाले हैं,यह तो और गले की हड्डी बने हुए हैं।निव यर की पार्टी आपसे बर्दाश्त नही होती और खुद के बेसिर पैर के त्यौहार हम पर थोप दे रहे हैं।सच बताएँ यह जो बात बात में व्रत आते हैं यह तो और जीना हराम किये हैं।इनकार कर दो तो धर्म संकट में,अब इनसे कैसे पूछे की धर्म के हिसाब से इन्हें भी वानप्रस्थ या सन्यास ले लेना चाहिए,मगर नही,वोह नही होगा।
बात असल में यह नही है की आपका कहना न माना जाए,बात यह है की आखिर ऐसा क्या है की एक उम्र पर आप ज़रूरत से ज़्यादा फिक्रमन्द हो जाते हैं।क्यों आपको लगने लगता है की यह सामने खड़ा लड़का कुछ नही जानता।आप भी जवान थे।आपके पास आजभी सैकड़ों किस्से हैं बेधड़क ज़िन्दगी गुज़ारने के।शरारते आपने हमसे ज़्यादा की हैं।तो अब आप क्यों हर बात में दखल दे रहे हैं।आपके भी माँ बाप ने आपको बेफिक्र ज़िन्दगी दी,तो आप हमें क्यों मिटठू बनाने पर तुले हैं।इस फ़र्क़ को समझये,बूढ़े हुए हैं तो बूढ़े होईये।ज़रा से जस्टिन बीबर को हमने क्या सुना की आपको मुकेश और रफ़ी की तारीफ़ का मौका मिल गया।हम कैटरीना पर अटके तो आप राखी और नगमा पर।इसमें कुछ भी बुरा नही,बल्कि बुरा यह है की इस बहाने आप हमे,हमारी जेनरेशन में बुराई निकालने का कोई मौका नही छोड़ते।अपनी तरह दूसरे की भी पसन्द की इज़्ज़त करिये।जेनरेशन गैप को समझये।अब सड़क पर वोह ज़िन्दगी नही रही जो तीस साल पहले थी।न वैसे लोग हैं, तो अपनी तरह बनाकर हमे आजके लिए नमूना तो मत ही बनाइये।
हम सबको भी बूढ़ा होना ही है, मगर सच कहे हम आपसा बूढ़ा होना कभी नही चाहेंगे।हम कभी नही चाहेंगे की हमारी निगाहें नौजवानों की बेड़ियाँ बने।हमारे बोल उनकी राह के काँटे।हाँ हमे वैसे बूढ़ा होना है जिसके लफ्ज़ से सुबह सुबह लगे,जिसके होने से घर चहके।जिसकी ज़िन्दगी घर को रूहानियत दे।जिसका साया हर छोटे बड़े को बढ़ने का मौका दे।यहाँ मेरा मकसद बुढ़ों की बुराई का रत्तीभर नही है, बस इतना समझाना भर है की हमे खुली ज़िन्दगी दीजिये जैसे आपको मिली थी।
अपनी हमपर की गई मेहनत को ज़ंज़ीर मत बनाइये।हमे हमारे वक़्त के हिसाब से बड़े होने दीजिये।हम महसूस कर सकते हैं आपकी फ़िक्र को,यक़ीन मानिये आपके हर लफ्ज़ हमारे कानों में रहते हैं, दिल में रहते हैं मगर जब आप एक ही बात को बार बार करते हैं तो यह लफ्ज़ कानों में गड़ने लगते हैं।दिल में चुभने लगते हैं।जो भी हो हम सबको वक़्त के साथ अपने आप को ढाल लेना चाहिए।आप ज़िन्दगी में कभी सत्तू में पिज़्ज़ा का मज़ा नही डाल सकते और हम चाहकर सत्तू में पिज़्ज़ा का,तो यही बेहतर है जो जिसे पसन्द है वोह खाए।इससे हम सब खुश रहेंगे।सुन रहे हैं न हम सब।ख़ाली आप या मैं नही।हम सब खुश रहेंगे।©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Thursday, September 22, 2016
बूढ़े क्यों नही बूढ़े हो रहे
Labels:
hafeezkidwai
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment