तुम्हारे दिल पर निकले छालों पर अपने नाख़ून रख सकता हूँ।तुम चीख़ उठोगे।तुम्हारे ज़ख्मो में नमक डाल सकता हूँ,तुम तड़प उठोगे।मेरे पास लफ्ज़ हैं, जिनसे तुम रोओगे,चीखोगे,तड़पोगे,मगर क्या होगा।कुछ भी नहीं।मैं अपने शहीदों की ऐसी दास्तान लिख सकता हूँ जिसपर तुम हफ्तों मायूस बैठोगे।मगर मैं ऐसा नही करूँगा।मेरे लिए तुम्हारे आँसू,तुम्हारी चीखों,तुम्हारी तड़पन की कोई ज़रूरत नही है।मैं तुम्हारे नकली दर्द में अपने लफ्ज़ बेकार नही करना चाहता।मैं तुम्हारे ज़बरदस्ती के रोने को अल्फ़ाज़ नही देना चाहता।मेरा हर लफ्ज़ उसके लिए है जो देश के लिए दिल से तैयार है।मैं उन्हें एक रत्ती भी शब्द नही दे सकता जिनका देश प्रेम कदम कदम पर बदलता हो।जो सैनिक की शहादत पर ज़बरदस्ती के आँसू निकाले और नागरिको की मौत पर ठहाके लगाए।मैं तिरँगे में लिपटे उस शहीद सैनिक की धड़कन को आवाज़ दूँगा जो आखरी तक अपने नागरिकों की हिफाज़त के लिए लड़ा।जिसका पहला और आखरी दिन अपने देश के नागरिकों के लिए था।मेरे लफ्ज़ तुम्हारे दिमाग को खुरच रहे होंगे।तुम्हारे सड़े दिमागों में नफ़रत की बदबू उठने लगी होगी।मुझे फ़र्क नही पड़ता।मैं हर उस के साथ हूँ जो दिल,दिमाग,रूह से मुल्क़ के साथ है।अभी वक़्त है सारा बनावटीपन छोड़ दो,दिलों से नफ़रत को निकाल दो और एक हो जाओ।तुम आपस में मामूली मामूली चीज़ के लिए लड़ते हो,खोखले विचारों के लिए लड़ते हो और दुश्मन।दुश्मन तुम्हारी दरारों में तेज़ाब डालकर,तुम्हारी रीढ़ तोड़ देता है।तुम्हारे दिलों में इतनी दरारे हैं, जिसपर हर बात बेमानी लगती है।एक बार खड़े होकर छत से,देश को देखो।हर हिस्से में नागरिक मर रहे हैं, लूटे जा रहे हैं,बलात्कार हो रहे हैं, नफ़रत में सर काटे जा रहे हैं, घर जलाए जा रहे हैं।जिसको यह सब दृश्य सुंदर लगते हों वोह मेरे शहीद सैनिकों का मातम मत ही मनाए।मेरे सैनिक मेरे नागरिकों के लिए शहीद हुए हैं।उन सैनिकों की रूह तुम्हारी नफ़रत और तोड़ने की आदत से बेचैन होगी।कोई कुतर्क मत देना,क्योकि तुम्हारे पास नफ़रत करने करने के इतने कुतर्क हैं की तुम्हारा उसमे साफ़ चेहरा भी नही दीखता।ऐ मेरे सैनिको तुम्हारी शहादत से हम टूट रहे हैं, वादा की अंत तक तुम्हारे मकसद के साथ रहेंगे।मुल्क़ का हर नागरिक खुश रहे,सुरक्षित रहे,तरक्की करे,यही तो तुम्हारा सपना है।हम सब पूरा करेंगे।©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Monday, September 19, 2016
सच्चा सलाम
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hafeezkidwai
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