Tuesday, September 20, 2016

फ़र्ज़ी

एक मुँह बोले सूफ़ी थे।खूब ज्ञान की उल्टियाँ करते फिरते।उनके पास हमेशा हर तरह के सवाल का जवाब रहता था।एक दिन एक पडोसी ने उन्हें आजिज़ करने की सोची।सुबह ही उनके दरवाज़े पर पंहुचा और सलाम करते ही एक सवाल दागा।अरे सूफी साहब, गू  का मज़ा क्या होता है? सूफ़ी साहब बेचारे ग़ुस्से में लाल पीले हो गए, दरवाज़ा बन्द कर लिया।अब क्या था ,रोज़ सुबह शाम उनसे यही सवाल,बेचारे वह भागने लगे।कोई राह ना सूझे।अज़ाब जान हो गया पड़ोसी।फिर तंग आकर अपने बुज़ुर्ग उस्ताद जो बेहद सच्चे और तजुर्बेदार थे,उनके पास पहुंचे।उनसे यह परेशानी बताई।उन्होंने उस पड़ोसी को बुलवा भेजा।उस शरारती पड़ोसी का उनसे भी वही एक सवाल।बड़ी ख़ामोशी से उन्हेंने जवाब दिया।मीठा।गू  मीठा होता है।पड़ोसी कहने लगा वह कैसे?क्या आपने चखा है।बुज़ुर्ग बोले नही बस उस पर मक्खियाँ बैठी देखी हैं।जहाँ तक हमे लगता है मक्खीयाँ ज़्यादातर मीठी ही चीज़ पर बैठती हैं।अगर आप चखकर तस्दीक कर दें तो मेरा जवाब पुख़्ता हो जाए।आने वाली नस्ल को मज़ा भी पता चल जाए और आपका नाम भी मशहूर हो जाए।अब क्या था पडोसी कहाँ भाग गए पता नहीं।उस्ताद ने अपने मुँह वाले सूफी को खूब हिदायत दी।कहा काम करो।लगन से मेहनत करो सिर्फ प्रवचन नहीं वरना तुम्हारे जैसों के ही लिए यह फालतू सवालों वाली तादात खड़ी है।यह लोग रोज़ तुमसे उलटे सीधे सवाल करेंगे जिनसे किसी का कोई मतलब नहीं, मगर तुम ऐसे ही उलझे रहोगे।यह तुम जो चीखते फिरते हो,यही तुम्हारे गले की हड्डी बनता है।इसलिए बोलने से ज़्यादा काम और इबादत में लगो वही खुदा की आवाज़ है।उससे अच्छे अच्छे बदल जाएंगे।नाकि तुम्हारी गला फाड़ आवाज़ से।©

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