घर के मुखिया की एक बड़ी कमज़ोरी है की वह जल्दी जल्दी अपने नौकर चाकर नही बदलते।उन्हें हद दर्जे लगाओ सा हो जाता है उनसे।दूधवाला जितना चाहे पानी मिलाए फिर भी उसे बदलना अच्छा नही लगता।वेंडर अख़बार चाहे जितनी देर में लाए उससे शिकयत के सिवा कुछ नही।कामवाली चाहे जितने बर्तन तोड़े मगर उसे बदलने को दिल नही करता।सफाईवाला चाहे हर चौथे दिन छुट्टी करे पर उसे बदलना ठीक नही लगता।यहाँ तक हम लोग सिलेंडर डिलीवर करने वाले से फ्रेंडली होकर चाहते हैं वही आए सिलेंडर देने।
इलेक्ट्रीशियन,प्लम्बर,पेंटर,सब्जीवाला,नाई हम सब अपने पुराने वाले ही इस्तेमाल करते हैं जो हमारे लिए किसी रिश्तेदार की तरह हो जाते हैं।बावर्ची तो ताउम्र साथ रहता है।ज़ायका चाहे अच्छा हो या बुरा वह एक नमक के साथ हम सबके लिए अपनी उम्र काट देता है।पता नही वह कौन सी साइकोलॉजी है जो नौकरों के साथ खड़ी हो जाती है।
अक्सर घरों में शिकायते होती हैं नौकर चाकर को लेकर,उनको बदलने के फरमान भी होते हैं फिर भी मुखिया इन्हें अनसुना कर तमाम कमी पेशियों के बावजूद अपने पुराने कामवालो को नही बदलते।
बदलना भी नही चाहिए।एक आत्मिक रिश्ता सा हो जाता है उनसे।हमने तो बचपन से ही एक धोबी को देखा,वह प्रेस करते में जितने चाहे कपड़े जलाए उसे बदलने की कभी कोशिश नही की गई।हमारे बावर्ची तो हम सबको इस हद तक डॉट सकते थे जैसे बाबाजान हो।
जो घर का ज़िम्मेदार होता है वह इनकी वफ़ादारी पर घर के किसी भी फर्द के मुकाबले इन पर ज़्यादा भरोसा करता है।वैसे हो सके तो अपने पुराने लोगों पर एतबार कीजिये।उनकी गलतियों को थोड़ा नज़रअंदाज़ करिये।यह एक पूरा ज़माना होते हैं जो आपके साथ बड़े हो रहे होते हैं।आपको देखकर अपने बच्चों के बढ़ने के ख्वाब संजो रहे होते हैं।यह अपनी कालोनियो में आपका ही रूप धर कर आपकी ही तरह बनकर अपनी ज़िन्दगी को निखार रहे होते हैं।यह अपने बच्चों के रोल मॉडल होते हैं इसीलिए कह रहे हैं इस खामोश सफ़र को मत रोकिये।गलतियों,कमियों के बावजूद एक ज़िम्मेदार की तरह इन्हें माफ़ कर अपने साथ रखिये।एक दिन इन्ही में से कोई पन्ना धाय बनकर आपके परिवार को शायद रौशनी दे जाए।अपने साथ इन्हें भी बूढ़ा होते देखिये।बुढ़ापे में यह ही आपके दिल के साथी होंगे।महसूस कीजिये बस।©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Friday, September 2, 2016
इनको बूढ़ा होने दें
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hafeezkidwai
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