Thursday, September 15, 2016

तीर में तीर

"तीर में तीर,लम्बी तीर,किसने बुलाया,हाफ़िज़ जी ने,काहे के वास्ते,शादी की...."बड़ा पुराना खेल रहा है।एक दूसरे का हाथ पकड़े धनुष की तरह का झुण्ड चीख़ चीख़ कर गाता जाता और खेल बढ़ता जाता।हमारे खेलों में हमारी संस्कृति छुपी हुई थी।हर वोह चीज़ पिरोई थी जो हमारे इर्द गिर्द थी।यह पूरा गाना बहुत कुछ समेटे था।बचपन में एक बार लौटीये और देखिये उन बच्चों को जो आपके साथ कदम दर कदम खेलते थे।आज वोह कहीं छुट गए हैं।दिनभर खेल के बाद थक कर जो सोता था तो अगली सुबह ही उठता।आज का वक़्त भी बड़ा बेहतरीन है।तब खेल जिस्म को थकाते थे आज दिमाग को।मैं आज के बच्चों पर कल के खेल नही लादना चाहता बस यह चाहत है की कल ही की तरह बच्चों को बेफिक्र माहौल मिले,भले ही वोह कुछ भी खेलें।
स्टीवर्ट फ्लेमिंग कहते हैं की अगर बच्चों को खुला दिमाग मिले तो भी वोह उतनी ही ऊर्जा खपाएँगे जितनी जिस्म से फ्री वाले।बस पाबंदियों से उनको जकड़े मत।एक बार बच्चे के दिल की धड़कन को सुनिए जब उसको आप बाहर जाने से रोकते होंगे।आप बॉस से छुट्टी मांगिये और वोह न दे तो जो दिल में मायूसी होती है वही मायूसी हज़ार गुना बच्चे को होती है जब उसे रोक दिया जाता है।उसका खूबसूरत गुलाबी दिल काला पड़ने लगता है।अपने बच्चे को हर तरह से आज़ाद माहौल दें,डराए मत।उसकी फ़िक्र करें मगर उससे छुपकर।बच्चे को खेल के लिए आगे बढ़ाइए।
मैं ऊपर एक खेल से चला था,कहाँ पहुँच गया।हाँ तो तीर में तीर के बाद जब शादी का नम्बर आता तो हममे से कई भाग जाते की इनके साथ तो नही ही करेंगे।मामूली से बचपन में भी पसन्द नापसन्द घर कर चुकी थी मगर खेल में मौजूद बड़े,बड़ी बड़ी आँखे दिखाकर करवा ही देते,मायूसी और  गुस्से से खेल जल्द ही बिखर जाता।अच्छा एक चीज़ आज भी समझ से परे है की इसमें हाफ़िज़ जी क्यों बुलाते हैं, अब्बा को बुलाना चाहिए,बात शादी की थी तो बड़े गौर करने पर समझ आया की हममे किस हद तक मज़हब घुसा था की खेल में भी हाफ़िज़ जी दांत निकाले शादीकरवा रहे थे।मैं बार बार कहता हूँ की किसी को भी एक झटके में मत पकड़ो,देखो उसका निर्माण कैसे हुआ है।एक एक घटना,खेल सब आपको बनाते हैं।आपको स्थायी विचार देते हैं।इसीलिए कह रहे हैं बच्चों पर हर उस चीज़ को बेहतरी से रखो जिसने तुमको तिनका तिनका जोड़ा है।©

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