काली झक शेरवानी,शैम्पू की हुई ज़बरदस्त काली दाढ़ी,होश उड़ा देने वाला इत्र।जनाब की रीढ़ बिलकुल सीधी, ज़बान में तलवार की धार सी सफ़ाई।जनाब के इंतज़ार में बेकरार महफ़िल।एक दम से सफेद चादर और गाँव तकिया से सजे स्टेज में जनाब की आमद हुई और महफ़िल ने ज़ोर ज़ोर से नारे लगाना शुरू किये।लग रहा था आज आसमान फट पड़ेगा।काली शेरवानी वाले ने धीमी सी सधी हुई आवाज़ में बोलना शुरू हुआ।धीरे धीरे लहजा गर्म होता गया और चेहरा सुर्ख़।महफ़िल ज़ार क़तार रो रही थी।जनाब रसूल की सीरत पर आ गए थे।उनके दो जौ की रोटी खाने और पत्थर पेट पर बाँध करके इंसानो को इंसान बनाने को बता रहे थे।रसूल और जौ की रोटी,महफ़िल रसूल की शिद्दत की मेहनत और सब्र पर बेतहाशा रो रही थी।जनाब चीख़ चीख़ के लोगो के दिलों में गर्म पानी डाल रहे थे।जब करीब तीन घण्टे बाद उनके दिल में जमा सारा मवाद बाहर आ गया तब उन्होंने सुकून पाया और तक़रीर खत्म हुई।
तभी एक मामूली सा आदमी उचक कर उनके सामने आया और कहा,मोहतरम आपने हमारी आँखे खोल दी,आज तो आपको हमारे साथ ही खाना खाना होगा।जनाब को पहले से पता था की हर तक़रीर के बाद यह क़ौम बेलौस मोहब्बत से भरकर दावत देने की आदी रही है।मुर्गा और बिरयानी उनका इंतज़ार कर रहा था।जनाब ने हामी भर दी।सबसे हाथ वाथ मिलाकर जनाब उसके घर पहुँचे।सामने खाना लगाया गया।जनाब खाना देख भड़क गए।सामने सिर्फ़ जौ की रोटी और सिरके में पड़ा प्याज़।जनाब को लगा इससे तो गला छिल जाएगा।सुर्ख़ आँखों से उन्होंने उस मामूली आदमी से पूछा की यह क्या है।उसने बड़ी मासूमियत से कहा हमारे रसूल वाला खाना।इससे अच्छा आपके लिए क्या हो सकता है।आज आपकी तक़रीर ने हमारी आँखे खोल दी।जनाब ने ख़ून का घूँट पीउसे देखा और कहा,बेवक़ूफ़।कहाँ मेरा गुनहगार मुँह और कहाँ रसूल।कहाँ यह रसूल के मुबारक होंटो को छूने वाली जौ और कहाँ मेरा गुनहगार मुँह।तुम उनके लुकमे को मेरे मुँह में लगाकर गुनहगार हो जाओगे।जाओ मेरे लिए कुछ मामूली सा,घूरे पर चरने वाला,तुम्हारा ठुकराया अनाज बीन बीन कर खाने वाला खाना लाओ।मेरा गुनहगार मुँह रसूल की बराबरी नही कर सकता,जाओ यह जौ की रोटी ले जाओ।बेचारे ने मासूमी से कहा तो वोह क्या है जो घूरे पर चरता हो।जनाब ने चीख़ कर कहा बेवक़ूफ़,मुर्गा लाओ।
खैर ऐसे जनाब हर जगह हैं।गली कूचे में हैं।एक बार इन्हें पकड़िये।देखिये इनके लफ्ज़ सिर्फ लफ्ज़ हैं या किरदार में हैं।यह आपसे बच्चे पैदा करने को कहेंगे मगर यह खुद इससे ख़ाली होंगे।यह वोह लोग हैं जो किसी दँगे,किसी धर्मयुद्ध में शहीद भी नही होते।यह माईक पर चीखते हैं और आप पागलो की तरह ख़ून पीने को तड़प उठते हैं।सरल जीवन जीने की सलाह देने वाले खुद इतनी कठिन ज़िन्दगी जीते हैं की कभी भी AC पंडाल,सेक्योरिटी,बड़ी बड़ी गाड़ियों से बाहर नही आते हैं।आप डिग्रियों का ढेर लगाकर भले अपने आप को पढ़ा लिखा कहें अगर यह आपको एक झटके में प्रभावित कर जाए तो आपकी कुण्टलो डिग्रियाँ दो कौड़ी की हैं।मज़हब को अपने दिल ओ दिमाग से समझे नाकी इनसे।बार बार कह रहा हूँ की अगर आप इनकी दलीलों में आकर चीखते हैं, लड़ते हैं तो प्लीज़ अपने आप को पढ़ा लिखा मत कहें।मेरे लफ्ज़ बुरे लगेंगे मगर एक बार अकेले में,ख़ामोशी से,अपने इर्द गिर्द ईश्वर का ध्यान करके इनके बोल और इनके किरदार को समझये,तौलिये,फ़र्क देखिये फिर दिल जो भी गवाही दे वोह ही ईश्वर की आवाज़ है।वही सच है।अपनी ज़िन्दगी को डमरू मत बनाइये।मुस्कुरा के जीइये और दूसरे की मुस्कान बचाए रखिये,ताकि हमारे बच्चों के चेहरों पर मुस्कान रहे और हमारा मुल्क़ मुस्कुराता रहे।©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Saturday, September 10, 2016
परत दर परत ज़बान
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hafeezkidwai
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