देखो इस लखौरी पर पैर मत रखना।यह मेरे गुज़रे हुए अपनों ने अपने हाथों से जोड़ी हैं।इसमें लगी माश की दाल मेरे अपने खेतों में हुई थी।तुम उस दरवाज़े की दहलीज़ पर भी पैर मत रखना,वोह मेंरे परदादा ने अपने परदादा के लगाए नीम के पेड़ से बनवाई थी।यह जो सामने मेरी टूटी हुई दीवारों की कोठी दिख रही है न इसमें आँगन में दो दर्जन पलंग लगते थे।सफेद चादरों पर बैठे हमारे अपने खूब हँसते ।ठहाके लगाते।ऐसे ठहाके की कमज़ोर दिल वाले डर जाते।आज सब खामोश है।आँगन में ऊँची ऊँची घाँस उगी हुई है।ताखों पर चरागों की जगह मकड़ी के जाले हैं।टूटी हुई छत पर झाड़ फानूस की जगह चमगादड़ लटकी हुई हैं।
आज तुम हमारे साथ हो तो बता दें,जब इस घर से हमारी दादी का जनाज़ा जा रहा था तो पास में फफकती बूढ़ी माई कह रही थी की भय्या यह घर ठहाकों से भरा हुआ था।यहाँ हँसी की आवाज़ें पिछली दीवारों तक सुनी जा सकती।सारे लोग खुशदिल और मज़ाकिया थे।फिर भी जब वोह ठहाके मारकर ज़ोर ज़ोर हँसते तो दूर पलँग पर बैठी बड़ी बी रोकती।वोह कहती अरे बेहयों इतना मत हँसो।ठहाके विरानीयत की अलामत हैं।यानि ठहाके आने वाले सन्नाटे की आवाज़ हैं।हम सब ठहाके लगाकर उन पर ही हँस लेते,मगर आज,क्या कहें।
ठहाके हमारे दिल को दहला देते हैं।तुम यह विरानीयत देख लो।टूटे चूल्हे और चबूतरे को देख लो।झड़े हुए दर ओ दीवार को देख लो।घर में टहलते नेवले और अबाबील को देख लो।मैं आज तुम्हे यहाँ लाया हूँ की जब कभी मैं बहुत खुश होकर ठहाका लगाऊँ तो प्लीज़ हमे हमारी बिखरी हवेली याद दिला देना।ज़्यादा ख़ुशी में मैं अपने पुरखों की तरह बहक जाता हूँ।हमारे ठहाके दूसरों के दर्द को नज़रअंदाज़ कर जाते हैं।हमारी खुद की हँसी हमारे कानो को बहरा कर देती है।मेरे कदमो को रोक लेना।मैं नही चाहता की मेरे फर्श में लगे संगमरमर को तोड़ कर उसमे घाँस निकले और मेरी नक्काशीदार खूबसूरत छत पर चमगादड़ लटकें।तुम पकड़ कर मेरे ठहाकों को मुस्कान में बदल देना।ऐसी मुस्कान जिसमें सबका दर्द हमेशा दिखता रहे।तुम ठहाकों में बहरा होने से रोक लेना मुझे।©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Friday, September 16, 2016
ठहाके वीरानीयत
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hafeezkidwai
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