मुझे जिस अल्फ़ाज़ को बार बार समझना होता है वोह है "और"।यह दूसरे अल्फाज़ो में फ़र्क को तो दिखता है साथ ही विस्तार भी देता है।बड़े ध्यान से इस "और" को समझये तो काफी कुछ समझ जाएँगे।मैं दो शब्द डाल रहा हूँ इसके साथ,उन शब्दों की सामूहिक व्याख्या आप जानते हैं बस इनके बीच लगे "और" को नहीं जानते।
धर्म "और" संस्कृति।अब है क्या इन दोनों को एक में तौल कर वोह काढ़ा तैयार किया जाता है जिससे कच्चे दिमाग बहक जाते हैं।अगर यह शब्द इतने ही एक दूसरे जैसे हैं तो इनके बीच "और" क्यों आया।यह और ही है जो हमे बता रहा यह दो अलग अलग चीज़ें हैं बस यह विस्तार की वजह से एक साथ हैं।
मेरी बात को समझये,इसकी कठिनाई में मत उलझये।बस इतना की ये जो धर्म है, यह बदलता नही है।संस्कृति पग पग बदलती जाती है।जब संस्कृति धर्म में मिलती है तब धर्म अपने मूल रूप को छोड़कर एक नया रूप धरता है।मैं यह बड़े विस्तार से लिख चुका हूँ इसलिएय यहाँ इशारा भर कर रहा की जिसे आप धर्म समझकर लड़ रहे हैं असल में वोह संस्कृति है।हल्के दिमाग के लोग संस्कृति को भूगोल से न जोड़कर धर्म से जोड़ कर सीना पीटते फिरते हैं।मैं परत दर परत धर्म,संस्कृति,भूगोल के घालमेल को लिख सकता हूँ मगर मेरे लिए आपके बीच सिर्फ एक सवाल छोड़ना है।धर्म और संस्कृति अगर इतने मिले जुले होते तो कब का "और" की जगह "या" ले चूका होता,यानि धर्म या संस्कृति।अब यहाँ मेरे नाम और भाषा पर मत अटकयेगा।यह बात मज़हब और मआशरे वालों के लिए भी ऐसी है।
यहाँ धर्म आपकी आत्मा में होता है जबकि संस्कृति भौतिक जीवन में।यदि वास्तव में आत्मा में धर्म है तो संस्कृति कभी नही टकराएगी।यदि सिर्फ ऊपर ऊपर ही धर्म है तो संस्कृति हर पल टकराएगी।हाँ एक बात और आप ज़ोर ज़बरदस्ती से संस्कृति तो थोप सकते हैं मगर धर्म नहीं।धर्म आत्मा से निकल कर परमात्मा में मिलता है जबकि संस्कृति सिर्फ़ आपके जिस्म से निकल कर दूसरों पर खत्म होती है।
एक हल्के से इशारे से "और" के सहारे बहुत कुछ लिखा,कहा,उतारा जा सकता है।अब जब कभी "और" देखिये तो एक मिनट सोचिये की यह क्यों है।क्या यह यहाँ ज़रूरी है।अगर ज़रूरी है तो किस हद तक ज़रूरी है।अगर हम इसे नज़रअंदाज़ करेंगे तो क्या नुकसान होगा।बहुत सी दिमाग की गाँठे "और" पर ठहरने से खुल जाएँगी।माफ़ कीजियेगा अगर कन्फ्यूज़ हुए हों तो भूल कर आगे बढ़िए।थोड़ा ज़्यादा समझना हो तो मेरी लम्बी व्याख्या पर बढ़िए।अगर समझ आ गया हो तो इसे खूब सोचिये और विस्तार दीजिये।आपकी हर कोशिश समाज की गाँठे सुलझाकर समाज को सरलता की तरफ ले जाना है।आप बेवजह नही पैदा हुए हैं बल्कि आप बावजह हैं। ©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Sunday, September 11, 2016
और
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hafeezkidwai
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