Monday, April 24, 2017

टूटते घिरौंदे

तालाब से चिकनी मिटटी निकाल कल घर लाए।लकड़ी की खपच्चो के साथ मिलाकर घर के एक कोने में छोटा सा घिरौन्दा बनाया।बढ़िया लिपाई की फिर चूने और दूसरे रँग से घिरौंदे को रँगना शुरू किया।दिल किसी भी हाल में इसे ख्वाबों का महल बना देने पर तेज़ तेज़ धड़क रहा था।उसके छोटे से आँगन में दो चार पौधे लगाए।कपड़े के गुड़िया गुड्डे घिरौंदे में रखे।पूरा घर दियों और चमक से भर दिया।दिल इतना जल्दबाज़ की घर को सूखने से पहले ही खेलने में आमादा।फिर अड़ोस पड़ोस के बच्चों के साथ उसमे खेलना।ख़ुशी अपने सातवे आसमान पर है।

एक दिन खेला, दो दिन खेला,तीन दिन खेला, फिर।।।फिर धीरे धीरे अपने बनाए घिरौंदे से दिल भरने लगा।शुरू में उसे सजा देने की ललक ठण्डी पड़ गई।खूब खेल लेने के बाद आखिर दिल भर गया।अब क्या।।।जिसने जिसने दीवाली के वक़्त घिरौंदे बनाए होंगे वोह इसे महसूस कर सकते हैं।हफ़्ते भर के बाद हम खुद इस घर को तोड़ते हैं।शुरू में जिसे मज़े और उल्लास से बनाते हैं उसे उसी उल्लास से हफ़्ते भर बाद तोड़ भी डालते हैं।

हम इंसान ही तो हैं।एक वक़्त के बाद चीजों से दिल भर जाता है।आज़ादी के बाद हमारे नेताओ ने हमारे देश को घिरौंदे की तरह बनाया था।अपने ख्वाबो का देश।हर चीज़ यहाँ लाकर रखी।हर चीज़ बनाई।मगर एक वक़्त के बाद तो दिल भरता ही है।तो अब इससे दिल भर चुका है।जैसे घिरौन्दा तोड़ते वक़्त तालाब से निकालकर मिटटी लाने की मेहनत हमारे ख्याल में नही आती,तिनका तिनका जोड़ने की ज़िद हमारे ज़हन में नही आती उसी तरह देश को बनाने वाली मेहनत को भूलकर हम सिर्फ खत्म करने में लगे हैं।हमारा अब दिल भर चुका है।

देश निर्माण हो चुका, हम आगे बढ़ चुके अब जो पीढ़ी है वो इससे खाई अघाई हुई है।इसीलिए  वोह सब भूलकर तहस नहस करने पर तुली है।हर चीज़ को तोड़ने पर एक उल्लास का माहौल है।हर एक को खत्म करने का आयोजन चल रहा है।हमारे घिरौंदे की टूटती दीवारें उनके कहकहों में धुंधली होती जा रहीं हैं।अब हमारा हमारे घिरौंदे से दिल भर चुका है।एक बार पलट कर देखिएगा देश में क्या क्या नही बनाया गया।हर तरह की सेना,विज्ञानं की प्रयोगशाला,बॉलीवुड,
स्कूल,यूनिवर्सिटी,इसरो,बड़ी बड़ी कम्पनी सब तो आ गए।तरक्की भी हो गई तो अब तो हमारा जी भर चुका है।अब तो बस बचपन के उस खेल को ही खेल रहें हैं।जब करने को कुछ न बचे तो ऊब होने ही लगती है।

यह उबाहट ख़ून,लड़ाई झगड़े,तोड़ फोड़ से वक़्ती शांत होती है।जब तक सब खत्म नही होता तब तक यह उकताहट भी खत्म नही होती।यह मत कहना की ऐसा नही है।जिस वक़्त हर मौत का बढ़िया बहाना मिलता रहेगा,ऐसा ही होगा।हर ख़ून पर वजह का पर्दा डाल कर उसे सही कहा जाएगा,तो यक़ीनन वोह घिरौंदे को तोड़ना ही कहलाएगा।और हाँ जिस तरह घर के बड़े,समझदार बच्चे को घिरौन्दा तोड़ते रोकते नही,उन्हें याद नही दिलाते की यह गलत है, अपनी मेहनत को बर्बाद करना बेवक़ूफ़ी है वैसे ही इस वक़्त सब कुछ नष्ट करने पर आमादा हमारे नौजवानों के पीछे खड़े बुज़ुर्ग भी हैं।

लो ढहती दीवारों को देखो,मुँह पर रुमाल रख लो कहीं धूल तुम्हारे फेफड़ो में दमा न कर दे।जाओ और विनाश का मज़ा लो।जो हो रहा है सब सही है।इस वक़्त जो अपने आँगन को देख ज़रा भी परेशान है वही देशभक्त है, सिर्फ वही बाकि मदमस्त,खुश और ठहाके लगाते लोग सबको पता है किसके काम आ रहें हैं।सब कुछ एक खेल ही तो था,खेल कभी न कभी खत्म होता ही है।

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